रामलीला को वैश्विक स्वरूप प्रदान करने के लिए विश्व संस्कृति परियोजना के तहत रामकथा, रामायण, रामलीला, अवध, अयोध्या आदि के संदर्भों में वैश्विक स्तर पर शोध, सर्वेक्षण व प्रस्तुति किए जाने की योजना है। इसी योजना के तहत अयोध्या शोध संस्थान के निर्देशन में रामलीला दल तीन देशों की यात्रा पर सोमवार को रवाना हुआ।
यह रामलीला दल 18 जुलाई से 2 अगस्त तक तीन देशों त्रिनिडाड, गुयाना और सूरीनाम में रामलीला का मंचन करेगा। संस्थान के व्यवस्थापक रामतीरथ ने बताया कि संस्थान के निदेशक डॉ. वाईपी सिंह के निर्देशन में 10 सदस्यीय रामलीला दल तीन देशों की यात्रा पर जा रहा है। दल में उत्कृष्ट कलाकारों का चयन उनके लीला कौशल के प्रदर्शन के आधार पर किया गया है।
बताया कि यह दल 18 से 22 जुलाई तक त्रिनिडाड, 23 से 29 जुलाई तक गुयाना और 27 जुलाई से 2 अगस्त तक सूरीनाम में रामलीला का मंचन करेगा। अयोध्या की रामलीला धार्मिक आस्था का केंद्र तो है ही, अब सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी माध्यम बन रही है। विश्व के 65 देशों में रामलीला का मंचन किया जाता है, जबकि भारत में करीब 100 तरह की रामलीलाएं प्रचलित हैं।
यह अवधारण सिर्फ शोध का विषय या कागजी नहीं है, बल्कि कुछ वर्षों में यह पूरी तरह से प्रमाणित भी हुई हैं। जब कई देशों के कलाकारों ने अयोध्या आकर रामलीला मंचन किया। अब तक अयोध्या में कई देशों की रामलीला मंडली लीला प्रदर्शन कर चुकी है। गत वर्ष रामायण मेले में 24 एवं 25 नवंबर को इंडोनेशिया एवं थाईलैंड की लीला मंडली ने अपने लीला से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
दीपोत्सव में भी इंडोनेशिया के मुस्लिम कलाकारों ने रामलीला मंचन कर राम की वैश्विकता को प्रमाणित करने का काम किया तो श्रीलंका के कलाकारों ने भी रामलीला का मंचन किया। 2015 में रामलीला के स्थानीय मंडली के कलाकारों ने थाईलैंड में रामलीला का प्रस्तुतीकरण कर अवध की महिमा का बखान किया। 2016 में भी अयोध्या शोध संस्थान में थाईलैंड की रामलीला का मंचन हो चुका है।
2017 में इंडोनेशिया के कलाकारों ने अवध विश्वविद्यालय में रामलीला का मंचन कर राम संस्कृति की दृढ़ता का परिचय दिया। अयोध्या शोध संस्थान के व्यवस्थापक रामतीरथ कहते हैं कि राम संस्कृति की यात्रा का गहन शोध और सर्वेक्षण किए जाने पर कामलवेल्थ की भांति यदि भारत के द्वारा रामायण संस्कृति के देशों का संगठन बन सके तो यह वैश्विक स्तर पर कम से कम 125 देशों का संगठन बन सकता है। जिसका मूल आधार संस्कृति होने के कारण सभी धर्मों व देशों के लोगों का लगाव होगा और राम द्वारा स्थापित मानव मूल्य, समाज मूल्य व राष्ट्र मूल्य वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में स्थापित हो सकेंगे।