मंडलीय अस्पताल में नेफ्रोलॉजी, डायबिटीज, चर्म रोग विशेषज्ञ, स्टोर रूम, इंजेक्शन कक्ष, चाइल्ड रिहैबिल क्लीनिक, पिट्रीयाटिक सर्जरी, स्पीच थिरैपी, चाइल्ड गाइडेंस क्लीनिक में चिकित्सक नहीं थे। अस्पताल के दूसरे फ्लोर पर भी सन्नाटा पसरा रहा।
यह हाल तब था, जब जांच के लिए मरीजों की बाहर कतारें लगीं थीं। बाद में सीएमओ ने कहा कि अस्पताल की पैथालॉजी अभी काम नहीं कर रही है। पैथालॉजिस्ट और टेक्नीशियन नहीं होने की वजह से मरीजों की जांच नहीं हो सकेगी।
बुखार से पीड़ित मोहिनी यादव को डॉक्टर ने देखा। कहा कि दवा व सही इलाज तभी हो सकेगा, जब ब्लड की जांच होगी। लेकिन मंडलीय अस्पताल में जांच सेवाएं ठप होने से उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। ऐसे दर्जनों मरीज थे, जिन्हें जांच न होने से परेशानी झेलनी पड़ी।
यही हाल श्यामकली (33) का था। उन्हें पित्त की थैली में पथरी की शिकायत थी। बोलीं, सोचा था कि मुख्यमंत्री जी आएंगे, बड़े-बड़े डॉक्टर होंगे और मेरा ऑपरेशन हो जाएगा, मगर यहां तो डॉक्टरों में पूछताछ करके कहा कि तुम्हारा इलाज हो गया।
यह हाल था मंडल मुख्यालय पर करोड़ों रुपये खर्च कर मुख्यमंत्री के हाथों लोकार्पित हो रहे सुपर स्पेशिएलिटी मंडलीय अस्पताल का। निर्माण व संसाधन अधूरे होने से तीन सौ शैय्या की जगह 100 बेड को ही चालू किया गया, लेकिन वहां भी संसाधन से लेकर डॉक्टर व सुविधाएं नदारद दिखीं।
अस्पताल में पहले ही दिन मरीजों को लॉलीपॉप मिला। ओपीडी के अलावा मरीजों को कोई भी चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाई। ऐसा लग रहा था कि जैसे कहीं स्वास्थ्य कैंप लगा हो, परामर्श लीजिए और घर जाइए। जांच करानी है तो जिला अस्पताल रेफर हो लीजिए।
ताज्जुब रहा कि जिला अस्पतालों से हाई दर्जे के मंडलीय अस्पताल में पहले दिन ही सब औपचारिक दिखा। मुख्यमंत्री ने जैसे ही वीडियो कांफ्रेंसिंग से पौने एक बजे शुभारंभ किया तो पहले तालियां गूंजीं, फिर मरीजों के पंजीकरण शुरू हुए। पहले मरीज के रूप में चंद्रप्रकाश का इलाज हुआ।
इसके बाद ओपीडी में करीब 20 डॉक्टरों की टीम ने 361 मरीजों को देखा और सामान्य दवाएं दीं। गंभीर रोगियों को पहले ही भर्ती व जांच सेवा न होने से जिला अस्पताल जाने की सलाह दे दी गई थी। अस्पताल में एक भी मरीज की जांच नहीं हुई और न ही मरीजों को भर्ती करने की सुविधा अभी उपलब्ध हो पाई।
हाल यह था कि अस्पताल में उतने चिकित्सक भी नहीं थे, कि नव निर्मित अस्पताल की ओपीडी के सभी कक्ष में चिकित्सकों को बैठाया जा सके। मंडलीय चिकित्सा में सर्जन डॉ. वसी अब्बास रिजवी ने पर्चे पर जांच लिखी है। श्यामकली को भी जांच के लिए जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।
अस्पताल में दो महिला चिकित्सक और एक स्त्री रोग विशेषज्ञ की तैनाती की गई है। अस्पताल के संचालन की जिम्मेदारी फौरी तौर पर बाराबंकी से स्थानांतरित होकर आए स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अरविंद सिंह को सौंपी गई है। इस बारे में डॉ. सिंह का कहना है कि जल्द की स्थानीय स्तर पर बेहतर व्यवस्था होगी। मरीजों को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा।
मंडलीय अस्पताल शुक्रवार से चालू हो गया है। अगले दो माह में पद सृजन कर चिकित्सकों व स्टाफ की तैनाती कर दी जाएगी। जरूरी उपकरण भी मुहैया कराए जाएंगे। - डॉ बद्री विशाल, अपर निदेशक मेडिकल केयर, लखनऊ
मंडलीय चिकित्सालय में वीआईपी मरीजों की कमी नहीं थी। जिलाधिकारी अनिल ढींगरा ने जिला अस्पताल से मरीजों के इलाज के बुलाए गए डॉ. एसपी राय को अपना कान दिखाया तो एसएसपी की नाक में दिक्कतें थीं। चिकित्सक ने दोनों मरीजों को पूरी तरह से फिट बताया। कहा कि किसी प्रकार की दिक्कत नहीं है। जिला सूचना अधिकारी ने भी अपने कान का इलाज कराया।
अस्पताल के लोकार्पण के लिए जनहित याचिका दायर करने वाले कूढ़ा केशवपुर निवासी मुरलीधर चतुर्वेदी शुक्रवार को सुबह साढ़े दस बजे गाजे-बाजे के साथ पहुंचे। स्थानीय नागरिकों ने अस्पताल के लोकार्पण के लिए मुरली की भूमिका की सराहना की। उन्होंने अस्पताल में मौजूद लोगों को मिठाई भी बांटी।