दीपावाली हिंदुओं के मुख्य त्योहारों में एक है। बुधवार को धुंधलका गहराते ही नगर, बाजार और गांव जगमग हो उठेंगे। खेतों, कुंओं, हैंडपंपों, कृषि यंत्रों, जानवरों की नांदों, मंदिर और दूसरे धर्मस्थलों पर दीप जलाये जाएंगे। महिला-पुरुष, लड़कियां-लड़के और बच्चे सभी दीपावली के जश्न में डूब जाएंगे। पटाखों के शोर से देर रात तक आकाश गूंजेगा। दीपावाली भगवान श्रीराम के अयोध्या वापसी की खुशी में मनाई जाती है। इस दिन गणेश-लक्ष्मी जी की पूजा का भी विधान है।
वाराणसी के विद्वान और फैजाबाद निवासी पंडित गुलाब पांडेय कहते हैं दीपावली के दिन की विशेषता लक्ष्मी जी के पूजन से संबंधित है। इस दिन हर घर, परिवार, कार्यालय में लक्ष्मी जी के पूजन के रूप में उनका स्वागत किया जाता है। दीपावली के दिन जहां गृहस्थ और वाणिज्य वर्ग के लोग धन की देवी लक्ष्मी से समृद्धि और वित्तकोष की कामना करते हैं, वहीं साधु-संत और तांत्रिक कुछ विशेष सिद्धियां अर्जित करने के लिए रात्रिकाल में अपने विशेष पूजा-पाठ व तांत्रिक कर्म करते हैं। विद्यार्थी और शोधार्थी बुद्धि, ज्ञान विवेक के लिए सरस्वती को पूजते हैं।
अयोध्या के वेदाचार्य पं. श्रुतिधर द्विवेदी बताते हैं कि स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन प्रात:काल स्नान आदि से निवृत होकर सभी देवताओं की पूजा करनी चाहिए। इस दिन संभव हो तो दिन में भोजन नहीं करना चाहिए। इसके बाद प्रदोष काल में माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। माता की स्तुति और पूजा के बाद दीप दान करना चाहिए। लक्ष्मीजी की पूजा में दीपक, कमल के फूल, जावित्री, लड्डू आदि को अवश्य शामिल करना चाहिए। नारद पुराण के अनुसार कमल के फूल तो माता लक्ष्मी को अतिप्रिय होते हैं। पूजा करने के लिए उत्तर या पूर्व दिशा में मुख करना चाहिए।