दो प्लॉट पर जैसे-तैसे फाउंड्री वर्क्स व कास्ट कला उद्योग संचालित है। बिजली का हाल सबसे खराब है। 10 घंटे बिजली मिलना मुश्किल है। सड़कों समेत तमाम दिक्कतें उद्यमियों को मुंह मोड़ लेने के लिए विवश करती हैं।
नगर पंचायत बीकापुर के तेंदुआमाफी से सटे इंडस्ट्रीयल एरिया कहने को है। जिला उद्योग केंद्र के अधिकारियों की लापरवाही और मिलीभगत से यहां की कीमती भूमि पर बने बड़े-बड़े हाल को कागजों में कई लोगों को दिया गया है।
47 साल से अधिक समय से एक हाल में भारतीय स्टेट बैंक संचालित है। इसके अलावा मिश्रा फाउंड्री वर्क्स के नाम से शिवनाथ मिश्र कास्ट आयरन की ढलाई करवाते हैं।
शेष चार ब्लॉक किसके नाम हैं, इसे कोई नहीं बता पा रहा है। छह में से सिर्फ दो ब्लॉक ही रोजगार के लिए ठीक हैं। शेष जीर्ण-शीर्ण होकर गिर रहे हैं। अधिकतर लोग भारतीय स्टेट बैंक के नाम से इस स्थान को जानते हैं।
बुर्जुग डीके सिंह व पारस पांडेय बताते हैं करीब चार दशक पूर्व यहां धागा मिल भी संचालित थी। लेकिन वह भी बंद हो गई। मजबूरन उसके कर्मचारी दूसरे काम धंधे में जुट गए हैं।
शिवनाथ मिश्र ने बताया कि उनकी फाउंड्री (वेल्डिंग-खराद मशीन) काफी दिनों से संचालित है। कास्ट आयरन की ढलाई होती है। कुछ साल पूर्व एक ब्लॉक राकेश सिंह नामक व्यवसायी ने लिया था।
कुछ दिनों तक सीमेंट ईट की ढलाई हुई, लेकिन अब वर्षों से बंद है। अब पता नहीं कि ब्लॉक का आवंटन किसके नाम है? बताया कि एक आवंटन उनके पुत्र के नाम है। उसमें भी कास्ट आयरन ढलता है।
एरिया के पीछे आद्या प्रसाद सिंह दुर्गा कास्ट कला के नाम से कहने को लकड़ी का काम करते हैं। यहां न तो बिजली है न ही लाइन। बैंक अवधि में पुलिस रहती है, लेकिन रात में सुरक्षा भगवान भरोसे है।
उद्यमी विवेक प्रताप सिंह ने कहा कि कास्ट कला उद्योग लगाए हुए हैं। बिजली मात्र 7 से 10 घंटे मिलती है। औद्योगिक क्षेत्र जैसा कोई इंतजाम व सुविधा नहीं है। सब कुछ कागज में ही फल-फुल रहा है।
व्यापारी नेता पारस पांडेय बोले कि बीकापुर को औद्योगिक हब बनाने के लिए यहां इंडस्ट्रीयल इस्टेट काफी पहले स्थापित किया गया, लेकिन अधिकारियों की उदासीनता से कोई काम नहीं हुआ है।
पूर्व सभासद राजन पांडेय ने कहा कि कहीं इंडस्ट्रीयल इस्टेट का बोर्ड तक नहीं लगा है। बाजार के बाहर का इलाका व निर्जन क्षेत्र होने के बावजूद सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं है।
पूर्व जिला पंचायत सदस्य संजय यादव ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की ओर से कभी भी इंडस्ट्रीयल इस्टेट के विकास को लेकर ध्यान नहीं दिया गया। इसी के कारण यहां उद्यमी धंधा बंद करते जा रहे गए।