अयोध्या। केंद्र व प्रदेश सरकारें एड्स पर नियंत्रण के लिए करोड़ों रुपये विभिन्न मदों में पानी की तरह बहा रही हैं, फिर भी इसके मरीजों की तादात लगातार बढ़ती जा रही है।
सिर्फ जिला अस्पताल स्थित एआरटी सेंटर के आंकड़ों पर ही गौर करें तो स्थिति चिंताजनक है। यहां साल भर में ही 264 एचआईवी संक्रमित नए मरीज चिह्नित किए गए हैं जबकि इसी वर्ष पूर्व के 199 मरीज मौत के मुंह में समा चुके हैं। इतना ही नहीं, एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी सेंटर में अब तक पंजीकृत कुल मरीजों की संख्या 3512 पहुंच चुकी है। इनमें सर्वाधिक मरीज अंबेडकरनगर व अयोध्या जिले के हैं।
जानलेवा बीमारी एड्स की चपेट में आने से लोगों को बचाने के लिए सरकार काफी समय से प्रयासरत है। इसके लिए विभिन्न माध्यमों से प्रचार-प्रसार के अलावा समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाया जाता है।
इसके साथ ही अनेक स्वयंसेवी समूह व सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा भी अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है लेकिन उत्सुकता व छोटी सी नादानी एवं लापरवाही से लोग अपनी जिंदगी से साथ खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहे हैं। नतीजतन एचआईवी का प्रकोप प्रतिवर्ष घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है।
जिला अस्पताल में एआरटी (एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी) सेंटर की स्थापना 26 सितंबर, 2012 को की गई थी। उसके बाद यहां एड्स की जांच व इलाज की व्यवस्था शुरू हुई। तब से आज तक इस केंद्र पर हुई जांच में 3512 मरीज एचआईवी संक्रमित पाए गए हैं।
इनमें से 3114 मरीजों की दवा इस केंद्र पर चली जिनमें से 417 ने दवा लेनी ही छोड़ दी जबकि 627 मरीजों की मौत हो चुकी है। खास बात यह है कि रोग की पुष्टि होने के बाद भी लोग अपने जीवन के प्रति गंभीर नहीं हैं। इनमें से 165 रोगियों ने दवा खाने से इंकार कर दिया है। मौजूदा समय में 589 मरीजों को अन्य जिलों में ट्रांसफर करने के बाद 1292 मरीजों का इलाज एआरटी सेंटर से चल रही है।
ये स्थितियां तो स्थापना काल से लेकर अब तक की हैं लेकिन सिर्फ एक वर्ष के आंकड़ों पर गौर करें तो हालात विपरीत नजर आ रहे हैं। मौजूदा वर्ष में एआरटी सेंटर पर 264 मरीज पंजीकृत हुए हैं जिनमें से 252 की दवा चल रही है। इनमें से 20 को ट्रांसफर कर दिया गया और दस ने दवा बंद कर दी जबकि 12 नए मरीजों की इसी वर्ष मौत हो गई।
इस सेंटर पर अयोध्या के अलावा अंबेडकरनगर, गोंडा, बस्ती, बलरामपुर, आजमगढ़ व अन्य जिले के मरीज भी आते हैं। इनमें सर्वाधिक मरीज अंबेडकरनगर व अयोध्या के हैं। इसके अलावा निजी नर्सिंग होम व पैथालॉजी में भी मरीज स्वेच्छा से जांच कराते हैं।
यदि उन मरीजों की संख्या जोड़ दी जाए तो आंकड़े निश्चित ही चौंकाने वाले होंगे। एड्स के इतने भयावह प्रकोप के बावजूद लोग अपने जीवन के प्रति सचेत नहीं हो रहे हैं जो काफी चिंताजनक है।