पूर्व सिंचाई मंत्री मुन्ना सिंह चौहान नहीं रहे। इस बात पर सहसा किसी को विश्वास नहीं हुआ। ...मगर बात सच निकली तो गांव-गांव मातम छा गया। महोली पहुंचा हर शख्स एक-दूसरे यही पूछता नजर आया कि अब किसानों की आवाज कौन उठाएगा?
गन्ना किसान तो उन्हें मुन्ना के बजाय गन्ना सिंह चौहान कहते थे, तौल में गड़बड़ी हो या फिर भुगतान में पेंच, जिले की चीनी मिलों का प्रबंधन, इनकी आवाज सुन किसान से सिफारिश करता फिरता था। किसानों के उत्पीड़न पर मुन्ना सिंह चौहान का सड़क जाम, प्रदर्शन, अधिकारियों का घेराव पहचान थी।
किसान नेता चौ. चरण सिंह की नीतियों को छात्र जीवन में ही आत्मसात करने वाले राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व सिंचाई मंत्री मुन्ना सिंह चौहान का जाना किसानों के लिए बेहद पीड़ादायक रहा।
हर साल किसानों को वे सम्मानित करते थे, इसमें प्रगतिशील किसान से लेकर उनके उन बेटों का सम्मान होता था जो अपनी मेधा व क्षमता से किसी भी क्षेत्र में सफल होते थे। पांच साल पहले प्रगतिशील किसान के रूप में स्व. चौहान के हाथों सम्मान पाने वाले लहरापुर के किसान शव देख रो पड़े।
बोले कि अब किसानों की आवाज मौन हो गई है। कौन हमारी खेती-बारी की समस्या पर सरकार व प्रशासन को आइना दिखाएगा। महोली के किसान व साथी हरिकिरत सिंह ने फफकते हुए कहा कि पूरे गांव को ही हर किसान को अपने इस बेटे पर नाज था।
तहसीनपुर के विजयशंकर पांडेय और रामऔतार ने कहा कि अब गन्ना मिलों की मनमानी पर कौन बोलेगा? जिले के नेताओं में तो लग्जरी लाइफ का शौक है, गन्ना सिंह तो जीवन भर खाटी किसान ही रहे। आम पहनावा, आम बातचीत। वे हमेशा अपनी अवधी बोली में ही जीये और लड़े।
शव के पास आए रालोद के युवा प्रभारी जयंत चौधरी से जब एक किसान ने पूछा कि अब रालोद और हम किसानों का क्या होगा? तो जयंत ने साफगोई से कहा कि यूपी में मुन्ना सिंह जैसा नेता हमें नहीं मिलेगा।
बोले कि ऐसे नेता बिरले होते हैं, यह अपूरणीय क्षति है। वे जब भी मिले एक ही मुद्दा होता था कि रालोद किसान की आवाज बनें। वे माटी से जुड़े थे, संगठन की शक्ति अभूतपूर्व था। मऊ से आए किसान नेता देवप्रकाश राय ने कहा कि जैसे ही सूचना मिली, पहले तो विश्वास नहीं हुआ, फिर सब काम छोड़ निकल पड़े अंतिम दर्शन करने।