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गवान राम की विश्व यात्रा पर होगा शोध

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अयोध्या-भगवान राम की दुर्लभ मूर्ति। - फोटो : FAIZABAD
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अयोध्या। भगवान राम की विश्व यात्रा पर अब शोध होने जा रहा है। इसकी जिम्मेदारी संस्कृति विभाग ने अयोध्या शोध संस्थान को सौंपी है। अयोध्या शोध संस्थान विश्व में राम से जुड़े चिह्नों को खोज कर उस पर शोध करेगा। इसके लिए 30 लाख का बजट भी स्वीकृत हो चुका है जिसमें पहली किश्त के रूप में 15 लाख रुपये अवमुक्त हो चुके हैं।
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भगवान श्रीराम अयोध्या के कण-कण में तो विराजमान हैं ही, राम की वैश्विकता पूरे विश्व में प्रमाणिकता के साथ है। विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं जैसे मैसोपोटामिया, सुमेरिया सहित अफ्रीका, अमेरिका आदि की जनजातीय परंपराओं में भी राम, हनुमान आदि की उपस्थिति आश्चर्य जनक है। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ चीन और जापान में रामायण केवल कला और संस्कृति के क्षेत्र में न होकर इनके संस्कार और जीवन पद्धति में भी विद्यमान है।
अयोध्या शोध संस्थान विश्व के विभिन्न देशों में भगवान श्रीराम से जुड़े चिह्नों को खोजकर उन पर शोध करने का काम करने जा रहा है।
मध्य अमेरिका के होंडुरास के जंगल में मिली भगवान हनुमान की दुर्लभ मूर्ति, इटली में दीवारों पर मिले पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व रामायण से जुड़े चित्र व इराक में भगवान राम और हनुमान की एक पेंटिंग के रूप में शिलालेख दरबंद-ए-बेलुला की चट्टानों पर पाया गया जो कि 2000 ईसा पूर्व का माना जा रहा है।
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इन पर अयोध्या शोध संस्थान द्वारा शोध किया जाएगा। यह शोध कार्य भगवान राम पर आधारित प्रस्तावित डिजिटल म्यूजियम में दस्तावेज के रूप में रखा जाएगा। इसके लिए प्रदेश सरकार ने संस्कृति विभाग को 30 लाख रुपये का बजट भी स्वीकृत कर दिया है जिसमें से 15 लाख अवमुक्त हो चुके हैं।
अयोध्या शोध संस्थान के प्रशासनिक अधिकारी रामतीरथ ने बताया कि अयोध्या शोध संस्थान भगवान श्रीराम पर आधारित शोध कार्य कर रहा है। इसी के परिप्रेक्ष्य में मध्य अमेरिका में दुर्लभ हनुमान जी की प्रतिमा प्राप्त हुई उसके संरक्षण के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। इसके साथ ही ईरान व ईराक में भी दुर्लभ चित्र मिले हैं जिस पर शोध कार्य होने हैं।
सभी का प्रस्ताव शासन में भेजा जा चुका है अब जल्द ही सर्वेक्षण का कार्य प्रारंभ किया जाएगा। वे कहते हैं कि राम संस्कृति की यात्रा का गहन शोध और सर्वेक्षण किए जाने पर कामनवेल्थ की भांति यदि भारत के द्वारा रामायण संस्कृति के देशों का संगठन बन सके तो यह वैश्विक स्तर पर कम से कम 125 देशों का संगठन बन सकता है। जिसका मूल आधार संस्कृति होने के कारण सभी धर्मों एवं देशों के लोगों का लगाव होगा और राम द्वारा स्थापित मानव मूल्य, समाज मूल्य व राष्ट्र मूल्य वसुधैव कुटुंबकम के रूप में स्थापित हो सकेंगे।
देश-विदेश में राम संस्कृति से जुड़े चिह्नों पर शोध की तैयारी शुरू हो चुकी है। सिरपुर छत्तीसगढ़ महासमुद्र जिले का स्थान है। जहां समुदाय के लोग चेहरे पर राम-राम लिखवाते हैं। यहां पांचवीं शताब्दी का रामलक्ष्मण मंदिर मिलता है। इस पर शोध किया जाएगा।
नेपाल के हिमालय की तराई में रामायण आधारित मुखौटे प्राप्त होते है। जिन्हें राजवंशी मुखौटे भी कहते हैं, यह भी शोध का विषय है। मध्य एशिया में राम के गुफा चित्र लगभग 4 हजार वर्ष प्राचीन प्राप्त होते हैं। यह मध्यपूर्व में राम संस्कृति की उपस्थिति प्रमाणित करती है। वहीं आंध प्रदेश में प्रत्येक गांव में रामालय हैं। लगभग 100 कोदंड राममंदिर दक्षिण भारत में हैं। इन सब पर संस्थान द्वारा शोध किया जाना है।
1865 में हुआ था रामचरित मानस का पहला अंग्रेजी अनुवाद
अयोध्या शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित पुस्तक अयोध्या पंचाग के अनुसार फ्रेडिरक सालमन ग्राउस ने 1865 में रामचरित मानस का अंग्रेजी में पहला अनुवाद किया था जो 700 पृष्ठ है। ग्राउस मथुरा के जिलाधिकारी भी रहे। इनके अनुवाद द्वारा जार्ज ग्रियर्सन तथा फादर कामिल बुल्के आदि जैसे यूरोपीय विद्वानों में रामकथा के प्रति अभिरूचि जागृत हुई। फादर कामिल बुल्के बेल्जियम निवासी थे जो 1935 में भारत आने के बाद राममय हो गए। इनके द्वारा 1960 में लिखी गई रामकथा आज तक का श्रेष्ठतम शोध है।
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