अयोध्या। सद्भाव व एकता की मिसाल के लिए बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी व रामजन्म भूमि के पक्षकार महंत रामकृष्ण परमहंसदास की दोस्ती ने किसी से छुपी नहीं हैै लेकिन इन शख्सियतों के जाने के बाद भी अयोध्या की धरती पर सौहार्द की कमी नहीं है।
यहां की मिट्टी व खुशबू में ही सौहार्द बसा है। हर गली-हर मोहल्ले में ऐसी हिंदु-मुस्लिम दोस्ती की अनेकों मिसालें हैं, जिनके आगे धर्म की दीवार ढह जाती है। परस्पर विपरीत विचारधारा के होने के बाद भी ऐसी दोस्ती की मिसालों ने समय आने पर धर्म की सीमाओं को लांघ कर भी अपने मित्रों की हिफाजत की है।
केस एक
70 के दशक से डॉ. रामशंकर व आफताब हैं दोस्त
पेशे से वकील सैय्यद आफताब रजा रिजवी व साकेत महाविद्यालय में प्रोफेसर रहे डॉ. रामशंकर त्रिपाठी 1970 से एक दूसरे के दोस्त हैं। इनकी दोस्ती की मिसालें ऐसी हैं कि पूरा शहर जानता है। डॉ. रामशंकर त्रिपाठी बताते हैं कि 60 के दशक में साकेत महाविद्यालय में पढ़ाई के दौरान आफताब से मुलाकात हुई थी।
कुछ दिनों के बाद हम लोगों के स्वभाव एक दूसरे से मिलने के कारण करीब होते गए। तब से लेेकर आज तक दोस्ती बरकरार है। शादी विवाह से लेकर जन्म व मृत्यु तक का साथ है। डॉ. रामशंकर त्रिपाठी बताते हैं कि वर्ष 1992 के दंगे में कुछ अराजक तत्वों ने उनके घर को घेर लिया था।
इस दौरान सैय्यद आफताब पूरी ताकत के साथ हर मोर्चे पर उनके साथ खड़े रहे। वह बताते हैं कि सैय्यद आफताब जैसे लोग हों तो बाबरी मस्जिद व राममंदिर जैसे विवाद मिनटों में सुलझ जाएं। दूसरी ओर सैय्यद आफताब के परिजन बताते हैं कि डॉ. रामशंकर त्रिपाठी हमारे घर के एक सदस्य के रूप में हैं। मौजूदा समय में सैय्यद आफताब रजा रिजवी बीमार चल रहे हैं।
केस दो
92 के दंगे में लगा था छूट जाएगा साथ
शहर में दोस्ती की जो मिसालें दी जाती हैं, उनमें दूसरा नाम अयोध्या शहर के हाजी असद व शैलेंद्र पांडेय का है। यह भी 70 के दशक से एक दूसरे के दोस्त हैं। साकेत महाविद्यालय में पढ़ाई करने के बाद यह एक साथ राजनीति में सक्रिय हुए। वर्ष 1988 में दोनों लोग अयोध्या नगरपालिका का चुनाव भी साथ-साथ लड़े।
बाद में शैलेंद्र पांडेय अयोध्या नगर निगम के चेयरमैन व हाजी असद सभासद बनने के बाद अयोध्या की सदन में भी साथ रहे। खास बात यह है कि दोनों लोग एक साथ कार्य भी करते हैं। हाजी असद बताते हैं कि वर्षों बीत गए लेकिन आजतक कार्य में हुए मुनाफे को लेकर कोई हिसाब किताब ही नहीं हुआ। जिसकी जैसी जरूरत रही, एक दूसरे की जरूरत को समझते हुए पैसे को दोस्ती के बीच में नहीं आने दिया।
वहीं, शैलेंद्र पांडेय का कहना है कि वर्ष 1992 के दंगे में जब इनके परिवार पर हमला हुआ तो सुबह जानकारी होने पर तुरंत वह अपनी गाड़ी से उनके घर पहुंचे लेकिन, पता चला कि इनका परिवार घर छोड़कर जा चुका है। इस समय मुझे इतना अफसोस हुआ कि लग रहा है अब साथ छूट गया। वह बताते हैं कि बाद में वापसी होने पर वह बहुत खुश हुए।
केस तीन
विपरीत विचारधारा के बाद भी अभिन्न मित्र हैं जमशेद व विनय
शहर में ऐसी मिसालें कम ही होंगी कि परस्पर विपरीत विचारधारा होने के बाद भी एक दूसरे के अभिन्न मित्रों के रूप में जमशेद अहमद व विनय कुमार सिंह बंटी जाने जाते हैं। दरअसल विनय कुमार सिंह बंटी विश्व हिंदु परिषद से ताअल्लुक रखते हैं और जमशेद अहमद का नाता एक सभ्रांत मुस्लिम परिवार से है।
दोनों 15 साल से एक दूसरे के लिए त्याग और कुर्बानी करते आए हैं। विनय कुमार सिंह बताते हैं कि ऐसे बहुत से किस्से हैं जो उनकी दोस्ती को धर्म और समाज से ऊपर ले जाते हैं। वह बताते हैं कि आज से पांच वर्ष पहले पढ़े लिखे होने के बावजूद वह बेरोजगार घूम रहे थे, तब जमशेद भाई ने अपने पैसे से दुकान खोलकर उनको दिया। साथ ही बराबर सहयोग भी करते रहे।
उन्हीं की वजह से आज सब कुछ ठीक हो गया। वह बताते हैं कि इससे बड़ी बात और जीवन में क्या हो सकती है। जमशेद अहमद बताते हैं कि मुझे लगा कि विनय कुमार बंटी एक अच्छे और सुलझे हुए व्यक्ति है, जिनके संपर्क में आने पर मुझे जीवन व समाज के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला।
केस चार
अशफाक-बिस्मिल जैसी है इनकी दोस्ती
शहर की दोस्ती का एक चर्चित चेहरा सूर्यकांत पांडेय व सलाम जाफरी का है। इनकी दोस्ती की मिसालें अशफाक-बिस्मिल की दोस्ती से दी जाती है। दोनों लोगों की मुलाकातें करीब 20 वर्ष पहले हुईं। फिर शहीद अशफाक उल्लाह के नाम से एक संस्थान बनाकर शहीदों के विचारों को आज तक लोगों में पहुंचा रहे हैं।
सलाम जाफरी बताते हैं कि वैसे तो बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनमें सूर्यकांत पांडेय का त्याग झलकता हैं लेकिन अभी हाल ही में अयोध्या में धर्म संसद का कार्यक्रम था, इस दौरान उनके घर में लड़की की शादी पड़ गई। बारात के लोग आने से मना कर दिए लेकिन सूर्यकांत पांडेय की अगुवाई में जब हिंदु समुदाय के दर्जन भर लोग उनके साथ गए तो बारात उनके घर आई और बिटिया की शादी संपन्न हो पाई।
वहीं दूसरी ओर सूर्यकांत पांडेय बताते हैं कि सलाम का पूरा परिवार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा और संकुचित विचारधारा का बिल्कुल नहीं है। यह परिवार धार्मिक कार्यक्रमों से लेकर सामाजिक कार्यक्रमों में अपनी पूरी सहभागिता करता है।