जिले के सभी बैंकों पर अब न ओवर टाइम का बोझ है, न अतिरिक्त कर्मी व काउंटर की व्यवस्था। नोटबंदी के बाद जैसे ही नोट बदलने का काम आरबीआई ने रोका, तभी से बैंकों ने अतिरिक्त काउंटर समेत कर्मियों की तैनाती हटा ली।
सोमवार से खुले बैंकों में लोग एक काउंटर पर निकासी का विड्रॉल व चेक लिए परेशान दिखे। तमाम लोग दूसरे दिन भी कतार में आए मगर बैंकों की बदइंतजामी से बैरंग लौटने को विवश रहे।
जिले के सवा दो सौ बैंक शाखाओं में ग्रामीण बैंक पूरी तरह सफेद हाथी बन गए हैं। केवल नोट जमा हो रहे हैं। ग्रामीण बैंकों की हालत इतनी खराब है नोटबंदी के बाद से करेंसी संकट बना हुआ है। ग्राहक रोज आते हैं और लौटने को मजबूर होते हैं।
यहां चेस्ट से नाममात्र का धन मिल रहा है। सहकारी बैंकों की हालत भी खराब है। यहां खाद-बीज बिक्री में मिली नगदी से लेन-देन चल रहा है। नोटबंदी के बाद शुरूआती दो सप्ताह तक अतिरिक्त काउंटर लगा, मगर अब दो दिन से पुराने ढर्रे पर काम चल रहा है।
शहर में एसबीआई, पीएनबी, बॉब, केनरा, इलाहाबाद बैंक, सेंट्रल बैंक समेत निजी बैंक एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, ऐक्सिस बैंक भी सुबह 10 बजे खुल रहे और चार बजते ही ताला लटक जा रहा है। लोगों की सहूलियत को देखते हुए न तो स्टाफ बढ़ाया गया और न ही काउंटर।
पीएनबी बैंक सिविल लाइंस आए दर्शननगर के विद्यासागर वर्मा का कहना था कि कई दिन तक आ चुके हैं, डेढ़ घंटे से कतार में हैं, अभी निकासी काउंटर पहुंचने में घंटेभर लग सकते हैं। मवई से आए बुजुर्ग दलसिंगार ने कहा कि देहात के बैंक में पैसा ही नहीं है, इसलिए यहां अपने खाते से धन निकालने को कतार में खड़े हैं।