पर्यावरण विज्ञान विभाग में तैयार होगा भवन
फैजाबाद। डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय की उपलब्धि में एक नया अध्याय और जुड़ने वाला है। विश्वविद्यालय अपने परिसर में सेंटर फॉर अंटार्कटिका इनवायरमेंटल रिसर्च शोध केंद्र खोलने जा रहा है। इसका प्रपोजल बनकर तैयार है। पर्यावरण विज्ञान विभाग में जल्द ही एक नया भवन तैयार किया जाएगा। इसमें चार आधुनिक प्रयोगशालाओं समेत अध्ययन केंद्र भी स्थापित होंगे। इसमें शोधार्थी अंटार्कटिका से लाए नमूनों पर शोध कर सकेंगे। महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अब अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के शोधार्थी अंटार्कटिका शोध के लिए जा सकेंगे। हालांकि शोधार्थियों को अंटार्कटिका जाने के लिए पूरी चयन प्रक्रिया से गुजरना होगा।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में पर्यावरण को लेकर 16 से अधिक बड़े प्रोजेक्टों पर शोध हुए हैं। इसमें चार शोध अंटार्कटिका के भी शामिल हैं। इन शोधों में कुछ नई खोज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व शोधार्थी करने में सफल रहे हैं। इसके लिए अब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने अंटार्कटिका शोध केंद्र खोलने का आदेश जारी किया है। इसका प्रस्ताव बनकर तैयार है। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के सामने खाली भूमि पर इसका निर्माण किया जाएगा। भवन की लागत एक करोड़ रुपये से अधिक है। इसमें चार आधुनिक प्रयोगशालाओं समेत अध्ययन केंद्र व शोधार्थियों के बैठने के लिए हाल बनाया जाएगा। इसमें एक कोल्ड रूम भी बनाया जाएगा। जिसका तापमान माइनस 10 से माइनस 14 डिग्री सेंटीग्रेट तक होगा। भवन का कार्य पूर्ण होने के बाद प्रयोगशालाओं के उपकरण के लिए एक करोड़ से अधिक की धनराशि लगेगी। इसके लिए देश की विभिन्न संस्थाओं से पृथ्वी मंत्रालय, काउंसिल ऑफ साइंटिफिक इंडस्ट्री रिसर्च व डिपार्टमेंट एंड टेक्नोलॉजी से मदद लेकर आवश्यक उपकरण लगाए जाएंगे। शुरुआती समय में पर्यावरण विज्ञान विभाग के शोधार्थी व बाद में पीएचडी से आने वाले शोधार्थियों को शोध करने का अवसर मिलेगा। इस प्रयोगशाला का प्रयोग माइक्रो बायोलॉजी, बायो कमेस्ट्री समेत अन्य विषयों के शोधार्थी कर सकेंगे।
प्रति वर्ष भारत से अंटार्कटिका जाते हैं 60 वैज्ञानिक
भारत सरकार प्रति वर्ष 60 वैज्ञानिकों को शोध कार्य के लिए अपने खर्चे पर अंटार्कटिका भेजती है। इसके ऑल इंडिया मेडिकल साइंस के तहत पूरी चयन प्रक्रिया में वैज्ञानिकों को पहले अपने प्रोजेक्ट संस्था में जमा करने होते हैं। प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने के बाद इंडियन तिब्बतन बॉडर्र पुलिस की ओर से बद्रीनाथ में ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद प्रति वैज्ञानिक पर लगभग 60 लाख रुपये खर्च कर भारत सरकार अंटार्कटिका भेजती है। वहां से वैज्ञानिक नमूने लाकर अपने शोध करते हैं। शोध के लिए आवश्यक यह है कि प्रयोगशालाएं उपलब्ध हो, इन शोधों के प्रयोगशालाओं का तापमान माइनस 10 से माइनस 14 के बीच में होना चाहिए, तभी शोध कार्य का ठीक ढंग से हो सकता है। कारण यह है कि अंटार्कटिका का तापमान हमेशा माइनस 10 से माइनस 14 के बीच में रहता है।
अब शोध करने वाले छात्र भी जा सकते हैं अंटार्कटिका
अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर जसवंत सिंह का प्रोजेक्ट दो बार ऑल इंडिया स्टूडेंट मेडिकल साइंस में शामिल हो चुका है। वह दो बार अंटार्कटिका हो आए हैं। उन्होंने 24 वें भारतीय अंटार्कटिका अभियान दल में शोध छात्रों को इस दल में शामिल कराए जाने की मांग की थी। इस पर भारत सरकार ने निर्णय लेते हुए शोध छात्रों को भेजे जाने की अनुमति प्रदान कर दी थी। इसके बाद से अवध विश्वविद्यालय के दो शोध छात्र भी अंटार्कटिका दल के साथ अपने शोध के लिए जा चुकें है। डॉ. जसवंत ने बताया है कि विश्वविद्यालय में अंटार्कटिका शोध केेंद्र खुल जाने से अधिक से अधिक शोधार्थी अंटार्कटिका जा सकेंगे। साथ लौटने पर उनको विश्वविद्यालय में शोध के आधुनिक प्रयोगशाला मिल सकेगी।
क्यों महत्वपूर्ण हैं अंटार्कटिका के शोध
अंटार्कटिका दक्षिणी ध्रुव का सबसे आखिरी प्रदेश है। यहां छह माह दिन व छह माह रात्रि होती। दिन के समय का तापमान सामान्य तौर पर माइनस 14 डिग्री सेंटीग्रेट व रात्रि के दिनों में तापमान माइनस 80 डिग्री सेंटीग्रेट तक होता है। यहां सामान्य तौर पर 200 किमी प्रति घंटा की गति से हवाएं चलती हैं। पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. जसवंत सिंह बताते हैं कि अंटार्कटिका में शोध इसलिए महत्वपूर्ण है कि पूरे विश्व का पर्यावरणीय औसत मिल जाता है। साथ ही भूगर्भ, समुंद्र सहित विभिन्न विषयों पर भी वैज्ञानिकों की ओर शोध किए जाते हैं।
विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के लिए जल्द ही सेंटर फॉर अंटार्कटिका इनवायरमेंटल रिसर्च खुलने जा रहा है। इसका सर्वाधिक फायदा यह होगा कि शोधार्थी को होगा। शोधार्थी अपने प्रोजेक्ट ऑल इंडिया मेडिकल साइंस में सम्मिट कर चयनित होने पर अंटार्कटिका की यात्रा कर सकते हैं। इसके लिए पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शोधार्थियों की पूरी मदद करेंगे।- प्रो. मनोज दीक्षित, कुलपति, अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद