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बचत के साथ उत्पादन भी हो रहा डेढ़ गुना

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बचत के साथ उत्पादन भी हो रहा डेढ़ गुना
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फैजाबाद। सिंचाई की आधुनिक पद्धति ड्रिप इरिगेशन इन दिनों किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। सरकार की ओर से अनुदानित दर पर उपलब्ध इस व्यवस्था से श्रम, पानी, उर्वरक आदि की बचत के साथ-साथ उत्पादन में भी डेढ़ से दो गुना वृद्धि हो रही है। इस तरह लागत मूल्य से किसानों को अधिकाधिक लाभ हो रहा है। जिले में अब तक कई किसान इस पद्धति को अपनाकर बेहतर लाभ कमा रहे हैं। बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति (ड्रिप इरिगेशन) किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। यह सिंचाई की एक विशेष विधि है, जिसमें पानी और खाद की बचत होती है। इस विधि में पानी को पौधों की जड़ों पर बूंद-बूंद टपकाया जाता है। इस कार्य के लिए वाल्व, पाइप, नलियों व एमिटर का नेटवर्क लगाना पड़ता है। इसे टपक सिंचाई या बूंद-बूंद सिंचाई कहा जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार टपक या बूंद-बूंद सिंचाई एक ऐसी सिंचाई विधि है, जिसमें पानी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में, कम अंतराल पर, प्लास्टिक की नालियों द्वारा सीधा पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। परंपरागत सतही सिंचाई द्वारा जल का उचित उपयोग नहीं हो पाता, क्योंकि अधिकतर पानी, जोकि पौधों को मिलना चाहिए, जमीन में रिस कर या वाष्पीकरण द्वारा व्यर्थ चला जाता है। इसलिए उपलब्ध जल का सही और पूर्ण उपयोग करने के लिए एक इस सिंचाई पद्धति का प्रयोग सुलभ है। जिला कृषि अधिकारी बीके सिंह के अनुसार कम दबाव और नियंत्रण के साथ सीधे फसलों की जड़ में उनकी आवश्यकतानुसार पानी देना ही टपक सिंचाई है। टपक सिंचाई के माध्यम से पौधों को उर्वरक आपूर्ति करने की प्रक्रिया फर्टिगेशन कहलाती है, जो कि पोषक तत्वों की लीचिंग व वाष्पीकरण नुकसान पर अंकुश लगाकर सही समय पर उपयुक्त फसल पोषण प्रदान करती है।
गन्ना विभाग की ओर से इस विधि का पहला प्रयोग विकास खंड पूराबाजार के सरायरासी गांव में किया गया। यहां के दयाप्रकाश सिंह के यहां 50 प्रतिशत अनुदानित दर पर करीब डेढ़ लाख रुपये प्रति हेक्टेयर क्षेत्रफल में यह प्लांट स्थापित किया गया। जिसका परिणाम रहा कि, पहले जिस खेत में करीब 60 क्विंटल प्रति बीघा गन्ने का उत्पादन होता था, अब वह करीब 100 क्विंटल पहुंच गया है। किसान दया प्रकाश सिंह ने बताया कि, खेत में बिछाई गई पाइपों के माध्यम से जल सीधे पौधों की जड़ों में पहुंच जाता है। इसके अलावा उर्वरक यहां बने सीवर टैंक में डाल देने से पानी के साथ घुलकर सीधेे जड़ों में पहुंच जाता है। इस तरह जल, उर्वरक और समय की बचत होती है। साथ ही उपयुक्त जल व उर्वरक मिलने से उत्पादन में भी काफी बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अलावा खेत की जोताई व खड़ाई भी अच्छी हो रही है। जिले की रौजागांव चीनी मिल क्षेत्र के दो किसानों ने भी इस संयंत्र के इस्तेमाल से बेहतर लाभ कमाया है।
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कैसे करें आवेदन
ड्रिप इरिगेशन पद्धति से सिंचाई का संयंत्र स्थापित कराने के लिए इच्छुक कृषकों को पहले कृषि विभाग की वेबसाइट पर पंजीकरण कराकर गन्ना विभाग में इस आशय का आवेदन प्रस्तुत करना होगा। विभाग की ओर से संयंत्र स्थापित करने के लिए संबंधित प्लांट का भौतिक सत्यापन किया जाएगा। तदुपरांत प्राप्त अभिलेखों के अनुसार संबंधित कंपनी को संयंत्र स्थापित करने की संस्तुति की जाएगी। पहले चरण में किसान को एकमुश्त धन व्यय करना होता है, बाद में अनुदान का धन कृषकों के खाते में विभाग द्वारा भेजा जाता है। विभाग के अनुसार अनुदान की दर प्रतिवर्ष बदलती भी रहती है।
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ड्रिप इरिगेशन पद्धति से उत्पादन अधिक होता है। साथ ही मानव श्रम, कीटनाशक, खाद व बीज की भी बचत होती है। ड्रिप सिस्टम में एक वैनच्यूरी होती है, इसके माध्यम से कीटनाशक, फफूंदी नाशक, रासायनिक खाद, तरल खाद पूरे खेत में समान मात्रा में एक साथ पहुंचते हैं। बूंद-बूंद सिंचाई से मृदा में नमी व उर्वरकता बनी रहती है। इसलिए यह पद्धति किसान के लिए हर तरह से लाभकारी है।-हेमराज सिंह, जिला गन्ना अधिकारी फैजाबाद
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