गुम होने के मुहाने पर ‘कजरी संस्कृति’
फैजाबाद। न उमंग और न ही उत्साह। विकल वेदना से फूट पड़ने वाले गीतों की गूंज भी मद्धिम। जबकि धरती पर हरियाली की चादर बिछी है, फलों की खुशबू हवाओं में बिखर रही है। कैलेंडर में सावन तो आ गया लेकिन जिस्म और जेहन सावन की उमंग से तर-बतर नहीं है। अब गांवों से झूला गायब हो गया। नए जमाने का ऐसा रंग चढ़ा है कि ‘पीहर’ की ही विदाई हो गई। कजरी गीतों से बहने वाली मिठास, विरह, विछोह सब गुजरे जमाने की बात रह गई है।
सावन माह के शुरू होते ही पुराएट पेड़ों की मजबूत डालियों में बांस और हेंगा का झूला पड़ जाता था। देर शाम तक महिलाएं झूला झूलते हुए कजरी गीतों को लयात्मक सुर देती थी। ये गीत लोकतत्व की चेतना से उपजे और रस में भीगे होते थे। लौकिक से अलौकिक की वैचारिक यात्रा जो अंतत: उस परमतत्व की ओर ले जाते थे, जिससे आत्मा को भोजन मिलता था। कलमी और हाइब्रिड पौधों का जमाना आ गया। मजबूत पेड़ गायब हो गए। जहां कही है भी, वहां पर भी झूले का सौंदर्य अब नहीं दिखता है। झूले गायब हुए तो इससे जुड़ी गीतों की एक समृद्धि व वैभवशाली परंपरा की डोर भी ढीली पड़ती जा रही है। अवधाचंल की देशज संस्कृति कजरी गीतों में बखूबी बयां हुई है लेकिन अब तो यह सिर्फ रस्म अदायगी भर रह गई।
लोक संस्कृति से बेहद लगाव रखने वाले कवि डॉ. हरिप्रसाद दूबे से जैसे ही कजरी गीतों पर चर्चा हुई तो वे गा उठे ‘अरे रामा जमुनी तोरन नहि जाबै, रैन अंधियारी रे हारी। बहिरे बाग ससुर जी का डेरा, देवरवा करत रखवाली रे हारी’। गीत-संगीत से जुड़ी देवकाली निवासी सोनी सिंह ने एक गीत के जरिये अपनी बात कही ‘दादुर, मोर, पपीहा बोले, तड़पत जियरा हमार सखी रे। श्याम नहीं घर आयो, काली-काली रैना कैसे गुजरे सखी रे..।’
कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने गांवों में ‘लोहे के बैल’ यानी ट्रैक्टर दाखिल हुए तो खेत-खलिहान की संस्कृ ति गायब हो गई, कमोबेश उसी तरह कजरी-संस्कृति भी मिट रही है, क्योंकि अब मायका जाने का रिवाज कम हो रहा है। यूं कहें कि पीहर की ही विदाई हो गई, देशी पेड़ों की जगह कलमी और हाडब्रिड ने ले ली है। समय रहते न चेते तो विराट व वैभव से भरी सावनी-संस्कृति पर छाया कु हासा घना होता जाएगा।
सिर्फ अयोध्या के मंदिरों में दिखता सावन
अयोध्या। सावन में प्रकृति का राग-रंग शिखर पर है लेकिन अयोध्या तो अद्भुत सौंदर्य में विराजमान है। सांस्कृतिक क्षितिज पर अयोध्या का सावन खास वैशिष्टय लिए हुए आया है। सावन 10 जुलाई को शुरू हुआ है। अभी रगंमहल और सद्दगुरुशरण गोलाघाट में झूलनोेत्सव चल रहा है। 26 जुलाई से मणिपर्वत पर झूलनोत्सव मेले से सभी मंदिंरों में झूले पड़ जाएंगे, यह पूर्णिमा तक चलेगा। तब क्या मंदिर, क्या मठ, हर जगह परंपरा की धारा संझा होते ही जगमोहन में फूट पड़ता है। शास्त्रीयता से ओत-प्रोत गीत-संगीत व नृत्य की त्रिवेणी मधुरिम धारा में बहती है। सरयू की मचलती स्वर्णिम लहरों में उतर भक्त अपनी आस्था अर्पित करते हैं।