शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा। टिक-टिक करती घड़ी की सूइयां। उसी ओर श्रद्धालुओं की निगाह। लेकिन भीतर ही भीतर आस्था उमड़-घुमड़ रही थी। उनके कदम तो ठहरे थे, लेकिन अंतर्मन में बह रही भावनाओं की सलिला श्रद्धालुओं के चेहरे पर बयां हो रही थी। दर्जन भर से ज्यादा स्थानों पर आस्था की अंतर्मन में लहराती लहर को पंचांग की गणनाओं ने बांध दिया था लेकिन जैसे ही परिक्रमा की शुभ घड़ी 7 बजकर 28 मिनट होने की सूचना घड़ी की सूइयों व मोबाइलों ने दिया, बंधे पैर एकाएक छूट गए।
श्रद्धा का जो बूंद-बूंद लाखों श्रद्धालुओं के हृदय में एकत्रित हो रहा था और जब उसे छलकने की पंचांग ने अनुमति दी तो मानों आस्था का समुंदर परिक्रमा पथ पर जगह-जगह लहराने लगा। भक्तों के कदम में, भाव-नर्तन की भाव-भंगिमाओं में, मानस की चौपाइयों में, जयश्रीराम, राम-राम और सीताराम के उच्चारण में। गगनभेदी जयघोष की सामूहिक आध्यात्मिक स्वरों से चौहदकोसी परिक्रमा पथ गुंजायमान होने लगी। मुश्किल से आठ बजते-बजते अयोध्या-फैजाबाद मानव-श्रृंखला में बंध सी गई।
ऐसा लगा जैसे कि दोनों नगर को दीपों की माला पहना दी गई हो। पथ पर जल रहे बल्बों को देख ऐसा लगा जैसे 42 किमी. लंबी रोशनी की गोलाकार रेखा खिंच गई हो। गुरुवार की शाम को सात बजकर 28 मिनट पर चौदहकोसी परिक्रमा शुरू हुई। श्रद्धालुओं ने परिक्रमा पथ पर अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार पहले से निश्चित किए गए स्थान से परिक्रमा के लिए कदम बढ़ाया।
दर्शननगर भीखापुर, देवकाली, जनौरा, नाका हनुमानगढ़ी, मोदहा, सिविल लाइंस स्थित हनुमान मंदिर, सआदतगंज, अफीम कोठी आदि स्थानों से श्रद्धालुओं ने पूरे भक्ति की रौ में परिक्रमा करनी शुरू कर दी। श्रद्धालुओं की सेवा के लिए जगह-जगह सेवा शिविर भी लगे हुए थे।
जलपान से लेकर चिकित्सा के पूरे इंतजाम परिक्रमा पथ पर खूब दिखे। आस्था के पथ पर चल रहे श्रद्धालुओं की सेवा करने के लिए भी हजारों हाथ उठे हुए मिले। दर्द निरोधक दवाएं और मलहम हाथों में लिए सेवा शिविरों में लोग खड़े थे। भीखापुर में लगे चिकित्सा शिविर में सेवा के लिए तत्पर स्वयं सेवक किसी को मलहम लगा रहे थे तो किसी को दर्द निरोधक दवा दे रहे थे। कमोबेश सेवा का ऐसा ही दृश्य अन्य कैंपों पर देखने को मिला।