कोहरे और तापमान में गिरावट से आलू में लगा झुलसा
फैजाबाद। इन दिनों लगातार बढ़ रही सर्दी और कोहरे के बीच आलू के खेत में झुलसा रोग लगना शुरू हो गया है। सब्जी की ज्यादातर फसलें प्रभावित हो रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एहतियात के तौर पर मैंकोजिन्ब दवा का फौरी तौर पर छिड़काव करना आवश्यक है, ताकि झुलसा रोग से फसलों को बचाया जाए।
जिले में इस बार चार हजार हेक्टेयर पर आलू बोआई का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। जिसके सापेक्ष कुल 3850 हेक्टेयर क्षेत्रफल आच्छादित किया गया है। इसके हिसाब से विभाग ने इस बार आठ लाख 37 हजार 550 क्विंटल आलू होने का आंकलन किया गया है। लेकिन मौसम की बेरुखी से इस लक्ष्य को पूर्ण कर पाना टेढ़ी खीर साबित हो रही है। इन दिनों कड़ाके की ठंड व शीतलहर का प्रकोप थम नहीं रहा है। भीखापुर के किसान जयदीप चतुर्वेदी ने बताया कि ऐसा मौसम लंबे समय बाद दिखाई पड़ रहा है। यदि मौसम में बदलाव नहीं हुआ तो फसल पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगी। गंगाराम का पुरवा के किसान अनिल पांडेय कहते हैं कि आठ बीघा आलू की खेती की है। उम्मीद थी कि बेहतर फसल उत्पादन करके अच्छी खासी आय हो जाएगी, लेकिन मौसम के मिजाज से डर लग रहा है। धर्मपुर के किसान अशोक तिवारी कहते हैं कि, इन दिनों धूप निकल नहीं रही है, एहतियात के दौर पर डालने वाली दवाएं भी बिना धूप के काम नहीं करेंगी। इससे यदि फसल रोग की चपेट में आई तो बर्बाद हो जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि, जब आसमान में बदली छाई रहती है, अधिकतम तापमान 10 से 15 डिग्री के बीच रहे व कोहरा व कम तापमान होने के साथ-साथ यदि आसमान में बदली छाई रहती है तो आलू में झुलसा रोग लगने की प्रबल संभावना रहती है। इन दिनों मौसम भी कुछ इसी तरह बना हुआ है।
बोले वैज्ञानिक, ये उपाय अपनाएं किसान
जिला उद्यान अधिकारी पारसनाथ ने बताया कि यदि मौसम में कोहरा, बदली या बूंदाबांदी होती है, तो रोग बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। यदि खेत में झुलसा रोग का प्रकोप होता है तो पत्तियों व डंठलों पर हल्के पीले धब्बे दिखाई देते हैं। पत्तियों के निचले भाग पर इन धब्बों में अगूंठीनुमा सफेद फफूंदी आ जाती है। इस रोग के नियंत्रण के लिए प्रतिरोधी किस्मों की बोआई करनी चाहिए। फसल में लक्षण दिखाई देने के पूर्व मैन्कोजेब 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव 8 व 10 दिन के अंतराल पर करते रहना चाहिए। फसल में भयंकर प्रकोप होने पर मेटालेक्सिलयुक्त दवाओं में 0.25 प्रतिशत के घोल का 1 व 2 बार छिड़काव करना अति आवश्यक है। इसके पश्चात यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि, एक रोग कामन स्केब होता है। इस रोग से फसल की पैदावार में कोई कमी नहीं आती, लेकिन कंद भद्दे हो जाते हैं। रोगग्रस्त कंदों के छिलके पर लाल या भूरे धब्बे बनते हैं। बीज वाले आलुओं को बोआई से पहले 3 प्रतिशत बोरिक एसिड के घोल में 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए।