शहर में बाइस ख्वाजा स्थित हजरत अरशद अली उर्फ माशूक अली का उर्स अकीदत के साथ मनाया गया। इस मौके पर अकीदतमंदों ने मजार पर फूल और चादर चढ़ाकर अल्लाह से दुआ मांगी। लोगों ने फातिहा भी पढ़ा।
इस दौरान तिलावत, दुरुद और सलाम का दौर चलता रहा। जोहर की नमाज के बाद कुल के फातिहा के बाद लंगर का एहतेमाम किया गया। इस मौके पर एसएसपी मंजिल सैनी समेत अन्य प्रशासनिक अफसरों ने भी मजार पर चादर चढ़ाई।
शहर में बाइस ख्वाजा की मजार है। बताया जाता है कि फतेहपुर सीकरी के बुजुर्ग ख्वाजा शमशुद्दीन शाह को उनके बारे में पता चला था। इसके बाद वह यहां पर आकर रुके थे।
मजार के पास की बैठकर इबादत की थी। उन्होंने ही जानकारी हासिल की थी कि उनका नाम अरशद अली उर्फ माशूक अली है। उनको बाइस ख्वाजा के नाम से जाना जाता है। हर साल उनका उर्स मनाया जाता है।
मंगलवार को फज्र की नमाज के बाद कुरानख्वानी के साथ उनका उर्स शुरू हुआ था। उर्स में शामिल होने के लिए दूरदराज से सूफी आए हुए हैं। उनके मुरीदों ने उर्स का सारा इंतजाम किया। रात में सूफी कव्वाली पेश की गई। इसके बाद सुबह से जोहर की नमाज तक दुरुद और सलाम का दौर चलता रहा।
इस दौरान तमाम हिंदू और मुसलिम अकीदतमंदों ने मजार पर हाजिरी लगाई। जोहर की नमाज के बाद कुल का फातिहा हुआ। इसमें मुल्क में अमन चैन, भाईचारा, परेशान लोगों की परेशानी दूर करने, बीमारों को शिफा देने की दुआ की गई।
उर्स पर एसएसपी समेत अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सर्वानंद यादव, एडीएम ज्ञानेंद्र सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट ईश्वरचंद्र, सदर विधायक रघुराज शाक्य, नफीसुल हसन, शीपू चौधरी, हादी हसन, वसीम कमर, हाफिज कमर, कौशल कमर, रमेश कमर, सूफी जावेद, खलीक कुरैशी आदि ने भी मजार पर चादर चढ़ाई।
सूफी शाह कमरुद्दीन लिकायत बोले, इस्लाम से दहशतगर्दी का कोई ताल्लुक नहीं
’दहशतगर्दी का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है। इस्लाम ने तो शुरू से ही मोहब्बत बांटी है। शरीयत का भी हुक्म है कि किसी को बुरा मत कहो और किसी को तकलीफ भी न पहुंचाओ। अकीदे पर कायम रहते हुए भी इस्लाम के बताए रास्ते पर चलना चाहिए। किसी को एक दूसरे को बुरा नहीं कहना चाहिए।’
ये बातें फतेहपुर सीकरी के प्रसिद्ध सूफी शाह कमरुद्दीन लिकायत ने कहीं। वह बुधवार को बाइस ख्वाजा में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सूफियों ने देश में भाईचारे का संदेश दिया है। सूफियों का काम जोड़ना है, तोड़ना नहीं। सूफियों ने दूसरों तक भी इस्लाम की तालीम पहुंचाई है।
मसलक के एतबार से मुसलमानों को बांटने के सवाल पर उन्होंने कहा कि सूफी इज्म अलग है और मौलवीयत अलग है। बरेलवी और देवबंदी अलग-अलग मौलवी के बताए अकीदे पर चलते हैं। उनको अपने अकीदे पर कायम रहकर इस्लाम की तालीम पर अमल करना चाहिए। कुरान में अल्लाह ने किसी दूसरे मजहब के खिलाफ बोलने से मना किया है।
अल्लाह ने हुजूर मुहम्मद (सअ) को भी रहमतुललिल आलमीन यानी सारे आलम का रखवाला बनाकर भेजा है। उनको दुनिया में सिर्फ मुसलमानों के लिए ही अल्लाह ने नहीं भेजा था। अल्लाह के नबी ने दुनिया में इंसानियत का पैगाम दिया।
उन्होंने अपने दुश्मनों को भी गले लगाया। किसी के लिए बद्दुआ तक नहीं की। इस्लाम को तोड़ने वाला दीन का रखवाला नहीं हो सकता है।
धर्म परिवर्तन के सवाल पर उन्होंने कहा कि धर्म इंसान के दिल का मामला है। इसको लालच से नहीं जोड़ा जा सकता है। जिसका दिल चाहे वह जिस भी धर्म के अनुसार अमल करे। किसी को जोर जबरदस्ती और लालच देकर धर्म परिवर्तन कराना ठीक नहीं है।