नार्मल डिलीवरी संभव होनेे के बाद भी सीजर ऑपरेशन से बच्चा पैदा करने को निजी नर्सिंग होम संचालकों ने कमाई का जरिया बना लिया है। कुछ प्राइवेट डॉक्टरों की बदली सोच ने धरती के भगवान का दर्जा प्राप्त डाक्टरों की छवि खराब कर रखी है। जिले के कई नर्सिंग होम तो सीजर की कमाई से ही चल रहे हैं।
यह खेल सालों से चलता आ रहा है। गांव से आने वाले कई परिवारों को कर्जा लेकर नर्सिंग होम की फीस भरनी पड़ती है। यही नहीं सीएचसी से लेकर जिला अस्पताल तक में नर्सिंग होम ने अपने एजेंट बिठा रखे हैं, जो अच्छे इलाज की बात कहकर मरीजों को नर्सिंग होम तक पहुंचाते हैं और बदले में अपना कमीशन ले जाते हैं।
स्वास्थ्य विभाग से जुटाए गए आंकड़ों पर नजर डालें तो करोड़ों के इस गोरखधंधे का पर्दाफाश हो जाता है। अप्रैल से दिसंबर 2014 तक सरकारी अस्पतालों में 20,176 डिलीवरी हुईं। सरकारी अस्पताल में केवल 119 बच्चे ऑपरेशन से पैदा हुए। जबकि प्राइवेट नर्सिंग होम में अप्रैल से दिसंबर 2014 तक 2670 डिलीवरी हुईं।
इनमें 1318 सीजर और 1360 नार्मल डिलीवरी हुईं। सवाल यह उठता है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में सीजर कम क्यों हुए। दरअसल यहां दूरदराज से आने वालीं गर्भवती महिलाओं के परिजनों को कोई न कोई कमी बताकर इतना भयभीत कर दिया जाता है कि वो नर्सिंग होम जाने पर मजबूर हो जाएं।
कैंपस में मौजूद एंजेट एंबुलेंस चालक मरीज को आसानी से अपने जाल में फंसाकर चहेते नर्सिंग होम में पहुंचा देते हैं और बदले में अपना कमीशन वसूल कर लेते हैं। सीजर के केस में नर्सिग होम के द्वारा 20 से 25 हजार तक वसूल किए जाते हैं।
एक बार भर्ती हो जाने के बाद डॉक्टरों के इशारे पर चलना गर्भवती के परिजनों की मजबूरी हो जाती है। डाक्टरों की मानें तो आपरेशन तभी करना चाहिए जब जच्चा-बच्चा की जान पर बन आए। लेकिन यहां तो केवल धन कमाने के उद्देश्य से ही नार्मल डिलीवरी नहीं की जाती।
ग्राहक की नजर से देखे जाने लगे मरीज
नर्सिंग होम में भर्ती होने के बाद ही प्रसूता के परिजनाें पर इतना मानसिक प्रेशर बना दिया जाता है कि वो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं रहता। भर्ती होते ही ब्लड टेस्ट, हिमोग्लोबिन, यूरिन, अल्ट्रासाउंड आदि की जांच कराने के लिए कह दिया जाता है। तीमारदारों को यह नहीं बताया जाता कि यह जांचे क्यों कराई जा रही है। कमाई के कारण अधिकतर नर्सिग होम ने कैंपस में ही जांच क ी सुविधा दे रखी है।
सरकारी अस्पतालों में सीजर तथा नार्मल
अप्रैल से दिसंबर तक डिलेबरी- 20,176
अप्रैल से दिसंबर तक सीजर - 119
नर्सिंग होम्स में सीजर तथा नार्मल
अप्रैल से दिसंबर तक नर्सिग होम में डिलेवरी- 2670
अप्रैल से दिसंबर तक नर्सिग होम में नार्मल डिलेवरी- 1360
अप्रैल से दिसंबर तक नर्सिग होम में सीजर -1318
सीएमओ डॉ. उदयवीर सिंह से दो टूक
प्रश्न: सरकारी अस्पताल की तुलना में नर्सिंग होम्स में सीजर केस ज्यादा होते हैं?
उत्तर: वास्तव में यह जांच का विषय है, हम नर्सिंग होम से डिटेल ले रहे हैं। सीजर प्रकरणों की केस हिस्ट्री देखी जाएगी। यदि बिना किसी कारण के ही सीजर किया गया है तो संबंधित नर्सिंग होम के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
प्रश्न: सरकारी अस्पतालों में नर्सिंग होम का नेटवर्क तोड़ने के लिए क्या कर रहे हैं?
उत्तर: सबसे पहले तो हम आशा बहुओं पर नजर रखने जा रहे हैं। यदि कोई आशा गर्भवती को नर्सिंग होम लेकर गई तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा कोई सरकारी डॉक्टर बिना किसी ठोस कारण के रेफर करता है तो उसके खिलाफ भी हम एक्शन लेंगे।
प्रश्न: जिला अस्पताल में सभी सुविधाएं होने के कारण सीजर कम क्यों हो रहे हैं?
उत्तर: सरकारी अस्पतालों में आवश्यकता पड़ने पर ही सीजर किया जाता है, जबकि नर्सिंग होम में नहीं। प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों में ही आना चाहिए यदि क ोई शिकायत है तो अधिकारियों क ो बताएं।