इटावा। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के निधन की सूचना पर गांव के बुजुर्ग उनके आवास के पास बने तालाब की चहारदीवार पर बैठकर उनके संघर्षों की चर्चाएं करते रहे। उन्होंने कहा कि संघर्ष और अपनों के प्यार ने ही उन्हें धरती पुत्र बनाया।
गांव के रामबहादुर (77) ने कहा कि करहल के जैन इंटर कॉलेज में हम कक्षा छह में थे, तब नेता जी कक्षा 12 में थे। नेता जी में शुरुआत से लोगों की बात उठाने का जज्बा था। वह स्कूल में भी साथियों को कोई परेशानी होने पर शिक्षकों और अभिभावकों के सामने खुलकर कह देते थे। नेता जी को बचपन से ही कुश्ती का शौक था।
वह गांव के चंदगीराम स्टेडियम की खाली पड़ी जमीन पर बने अखाड़े और उनके आवास के सामने खेतों में कुएं पर कुश्ती करते थे। यहां उन्होंने अपने साथ उस गांव के कई युवाओं को भी कुश्ती के दाव पेंच सिखाए।
यहीं पर चर्चा कर रहे गांव के ही रमेश चंद (60) बोले कि नेता जी ऐसे ही धरती पुत्र नहीं कहलाए। उन्होंने अपनों के लिए संघर्ष किया है। बताया कि 1980 में चुनावी माहौल था। उस दौरान एक दावत में गांव के लोग छिमारा गए थे।
यहां विरोधियों ने हमला कर दिया। हम लोग किसी तरह नेता जी और खुद को बचाकर गांव लाए थे। साथ में ही बैठे गांव के रामस्वरूप (70) ने कहा कि नेता जी ने पूरे गांव में कभी किसी को पराये जैसा महसूस ही नहीं होने दिया। किसी के घर में भी मुसीबत होते ही वह दौड़े चले आते थे।
गांव के शिवबरन सिंह मैनपुरी कोर्ट में कर्मचारी हैं। उन्होंने बताया कि हमारे पिता बालिस्टर नेता जी के बचपन के मित्र थे। दोनों के बीच इतना लगाव था कि पिता जी से छोटे-छोटे कार्यक्रमों में भी नेजा जी मिलने चले आते थे। होली की फाग में हमेशा पिता जी को गले लगाकर उनके हालचाल लेते थे।
हम छोटी बिरादरी के यह कभी एहसास ही नहीं होने दिया
सैफई। नेता जी किसी जाति बरादरी को नहीं मानते थे, वह जन जन के नेता थे। यह बात नेता जी की मौत से दुखी उनके बचपन के साथी और सैफई प्रधान रामफल बाल्मिकी ने कही। उन्होंने कहा कि जब पहली बार नेता जी मुख्यमंत्री बनकर आए तो उड़न खटोला देखकर महिलाओं ने घूंघट कर लिया था। जब नेता जी उड़न खटोला से उतरे तो मेरी मां और उनकी उम्र की महिलाओं से बोले कि अरे चाची हम अभेयो आपके लला मुलायम ही हैं। प्रधान ने बताया कि 1971 में उनके पिता बीमार थे। कैंसर से उनकी हालत बिगड़ गई थी। जानकारी मिलते ही नेता जी लखनऊ से सीधे घर पर मिलने आ गए थे। उन्होंने पिता जी को बेहतर उपचार का भारोस दिया था।
नेता जी कर्मस्थली रही है जसवंतनगर
जसवंतनगर। सैफई से आठ किलोमीटर दूर जसवंतनगर नेता जी की कर्मस्थली रही है। 1967 के बाद लगातार सात बार जसवंतनगर की सीट से विधायक रहे थे। अस्वस्थ होने की वजह से वह दो वर्ष से अपनी कर्मस्थली नहीं आ सके थे। निधन की जानकारी मिलते ही नगरवासी फफकने लगे। शोक में बाजार बंद हो गया और लोग सैफई की ओर दौड़ने लगे। रामलीला समिति जसवंतनगर द्वारा आयोजित समस्त कार्यक्रम भी निरस्त कर दिए गए। समिति के मंत्री हीरालाल गुप्ता ने बताया कि जसवंतनगर के लोगों से 55 वर्षों पुराना नाता था। यहां के गांवों गलियों तक में उनकी अपनी पहचान थी। संवाद