इटावा। रंगमंच हमें अलग-अलग दृष्टिकोणों का अनुभव कराता है। संवाद, एकालाप और चरित्र की जांच करने का तरीका भी सिखाता है। थिएटर को समझने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि इंसान होने का क्या मतलब है।
विश्व रंगमंच दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों में इसके प्रति जागरूकता लाना और रंगमंच के महत्व को समझाना है। रंगमंच न सिर्फ लोगों का मनोरंजन करता है बल्कि उन्हें सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक भी करता है। विश्व रंगमंच दिवस पर कुछ ऐसे युवा कलाकारों ने साझा किए विचार।
सामाजिक मुद्दों पर लघु फिल्में बना रहे
चौगुर्जी निवासी रविंद्र चौहान 2005 से रंगमंच की दुनिया से जुड़े थे। अभिनय और नुक्कड़ नाटकों की बदौलत उन्हें न सिर्फ कई पुरस्कार मिल चुके हैं बल्कि वह सामाजिक मुद्दों पर लघु फिल्में तक बना रहे हैं। वर्ष 2018 में चंबल सिने प्रोडक्शन की स्थापना की थी। बताया अभिनय की बारीकियां सीखने के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली, स्वतंत्र रूप से मंडी हाउस दिल्ली, श्रीराम सेन्टर नई दिल्ली, भारतेन्दु नाट्य अकादमी लखनऊ, संगीत नाट्य अकादमी लखनऊ, से कार्यशाला के माध्यम नाट्य विधा में प्रशिक्षण प्राप्त किया। वह 30 से अधिक स्टेज शो पर्यावरण, दहेज, कन्या भ्रूण हत्या, साक्षरता, बाल शिक्षा, नारी सशक्तीकरण विषयों पर कर चुके हैं। बच्चों के लिए 150 से अधिक रंगमंच नाट्य कार्यशाला में अभिनय प्रशिक्षक के रूप में आयोजन कर चुके हैं।
नाटक बचपन से प्रभावित करते आए
अभिनेता संदीप भदौरिया ने बताया कि नाटक बचपन से प्रभावित करते आए थे। मैंने खुद नाटक करना शुरू किया। स्कूल में होने वाले नाटकों का हिस्सा रहे। वर्ष 2005 में लखनऊ में एक्टिंग वर्कशॉप ली फिर ये सिलसिला चलता रहा। वर्ष 2006 में मुंबई आए, कुछ समय काम करने के बाद 2008 में लंदन गए और वहां यूरोपिन थिएटर में काम किया। वर्ष 2012 में पृथ्वी थिएटर मुंबई में गुलजार साहब, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी की निगरानी में ग्रुप में रंग मंच से जुड़ा रहा। इस समय एक्टिंग इंस्टीट्यूट मुंबई से एक्टिंग, थिएटर का कोर्स। जब रंग मंच का परदा उठाया वह तो आपका कलाकार दुनिया को दिखा। बुद्धिजीवियों खासकर युवाओं से कहा कि जीवन में भी रंग मंच का होना बहुत जरूरी है।
भावनात्मक रूप से जगाने का साधन है रंगमंच
अध्यापक रामजनम सिंह ने बताया रंगमंच और अभिनय उनके पसंदीदा क्षेत्र रहे हैं। शुरुआत उन दिनों की है जब कॉलेज में थे और छात्र संघ जनवादी लेखक संघ का एक नाट्य दल हुआ करता था। नुक्कड़ नाटक किया करते थे। जनता को जगाने का कार्य करते थे। नाटक,रंगमंच और अभिनय की विधिवत शिक्षा उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी से ली, स्क्रप्टि मेकिंग की और फिर फिल्में बनाई। रंगमंच न सिर्फ मनोरंजन का साधन है, बल्कि ये लोगों को सामाजिक और भावनात्मक रूप से जगाने का भी साधन है। थिएटर एक ऐसा जीवंत माध्यम है जिसमें सब संवावनाएं मौजूद हैं। शरीर की लय-ताल, मुखमुद्रा, आवाज और भाव यही सब संसाधन होते हैं और उनके संयोजन से ही अभिव्यक्ति की स्पष्टता और प्रखरता बनती है।
जीवन के हर पहलू में संभाला
फिल्मी दुनिया में कदम रखने वाले अभिनेता अंशुमन प्रबल बताते हैं कि प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने इटावा में ही भारतेंदु नाट्य अकादबी लखनऊ के एक निर्देशक मनोज शर्मा के जरिये आयोजित रंगशाला से रंगमंच के सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद इटावा में कई नाटकों का मंचन करने के बाद दिल्ली में भी रंगमंच करते रहे। दिल्ली से उन्होंने टीवी शो में भाग लिया, फिर मुंबई की ओर रुख किया और कई नाटक करने के बाद झुकाव फिल्मों की ओर हो गया। बताया कि रंगमंच का प्रभाव उनके जीवन पर इतना गहरा है उनके जीवन के हर पहलू में रंगमंच ने उन्हें संभाला। उन्होंने बताया कि रंगमंच ने उन्हें जीने का सलीका सिखाया।