भोजन से भरी थाली सामने हो और छूने भी न दी जाए। कुछ ऐसे ही हालात गरीब बेसहारा लोगों की बनी है। सड़क के किनारे खोखा डालकर परिवार के साथ गुजर बसर करने को मजबूर इन गरीबाें को आवास मुहैया नहीं हो रहे हैं। जबकि जिले में निर्मित कुल 3228 कांशीराम आवासों में से 545 खाली पड़े हैं। आलम यह है कि करीब साढ़े पांच सौ पात्रों की लिस्ट धूल फांक रही है।
बसपा सरकार में कांशीराम आवास योजना बेहद महत्वपूर्ण रही है। मुख्यमंत्री मायावती का इस योजना पर विशेष ध्यान रहा। जिले में इस योजना के तहत कुल 3228 आवास बनाए गए। हालांकि भरथना के 228 आवास अभी पूरी तरह कंपलीट नहीं हो पाए हैं। फिर भी इटावा नगर के अलावा भरथना, जसवंतनगर, बकेवर और इकदिल में कालोनियां खड़ी की गई हैं।
बसपा सरकार में तो गरीब पात्रों के चयन और उन्हें आवास देने में तत्परता बरती जाती थी। लेकिन जबसे सत्ता परिवर्तित हुई है, यह योजना गड्ढे में चली गई। यहीं वजह है कि जो आवास बनाकर गरीबों को उपलब्ध कराए गए।
उनमें शत प्रतिशत कब्जा नहीं हो पाया। वह या तो अवैध कब्जे के शिकार हैं या फिर खाली पड़े हैं। उधर सड़क के किनारे प्लास्टिक की पन्नी में गुजर बसर करते हुए गरीबों को आसानी से देखा जा सकता है। अफसोस है कि प्रशासन के पास ही अभी करीब साढ़े सौ पात्र लोगों की लिस्ट पड़ी हुई हैं। जिन्हें अब तक आवास मुहैया नहीं हो पाए हैं।
जबकि तकरीबन कुल मिलाकर एक हजार आवेदन आवास पाने के लिए अधिकारियों के पास आ चुके हैं। मगर इस योजना की उपेक्षा किए जाने के चलते इन गरीबों के आवेदनों पर गुजरे करीब तीन वर्षों में कोई सुनवाई नहीं की गई।
पीओ, डूडा, मिथलेश अवस्थी ने बताया कि डीएम ने निर्देशानुसार कांशीराम आवासों में अवैध कब्जेदारों और खाली पड़े आवासों की जांच की जा रही है। इसके बाद स्थिति साफ हो जाएगी। उसके बाद संभव है कि शासन से अनुमति लेकर पात्रों की लिस्ट से आवास मुहैया कराए जाएं। हालांकि पात्रों की लिस्ट पुरानी हो चुकी है। लिहाजा उसकी भी जांच होना जरूरी है।