मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के तौर पर यूपी को दो-दो मुख्यमंत्री देने वाला जिला आज भाजपा सरकार में हाशिये पर है। पांच साल तक वीआईपी ओहदे का सम्मान पाने वाले इस जिले को योगी मंत्रिमंडल में कोई तवज्जो नहीं दी गई। खास बात ये है कि जिले वासियों से ये रुतबा तब छीना गया है, जब मंत्रिमंडल में यूपी के हर क्षेत्र और वर्ग को साधने की कवायद की गई है। यहीं नहीं जिले के वोटरों ने भी तीन में से दो सीटें भाजपा की झोली में डालकर अपनी भागीदारी बखूबी निभाई हैं। लोगों को उम्मीद थी कि दो महिला विधायकों में से किसी एक को राज्य मंत्री से जरूर नवाजा जाएगा।
यूपी में भाजपा सरकार के सत्ता संभालते ही जिले की वीआईपी हनक के बरकरार रहने न रहने पर चर्चा शुरू हो गई। आने वाले दिनों में योगी सरकार का जिले को लेकर क्या रुख रहेगा, फिलहाल ये तो साफ नहीं है। लेकिन सपा सरकार के रहते जिले को जो महत्व लखनऊ में मिलता रहा, वैसा मुमकिन नहीं है। सपा के गढ़ में भरथना और इटावा विधानसभा सीटों पर क्षेत्र के लोगों ने सपा के वर्चस्व को तोड़ते हुए भगवा फहराया है। भरथना में सावित्री कठेरिया की जीत इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यहां आजादी के बाद पहली बार भाजपा जीती है। इसी तरह सपा की प्रतिष्ठा से जुड़ी इटावा सदर सीट भी सरिता भदौरिया के रूप में भाजपा की झोली में आई।
जिले के लोग अपनी ये मंशा 2014 के लोकसभा चुनाव में जता चुके हैं। इटावा, औरैया और कानपुर देहात की कुल 5 विधानसभा क्षेत्रोें की इटावा संसदीय सीट से भी भाजपा के अशोक दोहरे को जिताया था। सपा सरकार में हुए उक्त लोकसभा चुनाव में भी जिले के लोगों ने भाजपा और खास कर नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी आस्था जताई थी। समाजवादी पार्टी के गढ़ में भाजपा बढ़ती पैठ के बावजूद जिले से किसी विधायक को योगी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।
जिले में पहले भी 1991 और 1996 के विधानसभा चुनावों में सदर सीट से भाजपा विधायक जीत हासिल हो चुकी है। लेकिन जिलेवासियों को वीआईपी रुतबा सपा सरकार के दौरान ही मिलता रहा है। यही वजह रही है कि सत्ता से बाहर होने के बाद भी जिले में सपा की धमक बरकरार रही है। इस बार यह कयास अवश्य लग रहे थे कि भाजपा सरकार में जिले का भी प्रतिनिधित्व रहेगा। लेकिन ये पूरा नहीं हो सका।