बाजार में सजी चुनरी-प्रसाद की दुकानें
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नवरात्र का पर्व शुक्रवार से शुरू हो रहा है। जिले भर के देवी मंदिरों में नवरात्र की तैयारियां शुरू हो गई हैं। मंदिरों में साफ-सफाई के साथ भव्य सजावट की जा रही है। इसके साथ ही घरों में भी देवी भक्तों ने नवरात्र पूजन की तैयारियां शुरू कर दी हैं। माता की आराधना में प्रयोग होने वाली पूजन सामग्री,चुनरी, कलश आदि की खरीददारी के साथ व्रत सामग्री जुटाने में देवी भक्त लगे हुए हैं। शुक्रवार भोर घर-घर में कलश स्थापना के साथ जिले भर में माता के जयकारे गूंजने लगेंगे।
ज्योतिषाचार्य पं. शिवकिशोर दुबे के अनुसार शुक्रवार को प्रात:काल से दोपहर 2:26 बजे तक कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त है, जो लोग किसी कारण वश भोर में कलश स्थापना न कर सकें तो 11:36 बजे से 12:24 बजे के बीच अभिजित मुहूर्त की शुभ घड़ी में कलश स्थापना कर सकते हैं। पं शिवकिशोर दुबे के अनुसार इस बार पंचमी की तिथि घटने से नवरात्र आठ दिन की होगी और पहले दिन माता शैलपुत्री की आराधना के साथ शुरू होने वाले नवरात्र 15 अप्रैल को पूर्ण हो जाएंगे।
नवरात्र के पावन पर्व पर प्राचीन मंदिरों पर देवी भक्तों सैलाब उमड़ता है। इनमें शहर के यमुना तट पर स्थित प्राचानी कालीबांह मंदिर, लखना के कालका मंदिर व बलरई के ब्रहमाणी देवी मंदिर शामिल हैं। इन प्राचीन मंदिरों पर नवरात्र के मौके पर भव्य मेला लगता है और दूर दूर से लोग यहां पूजा अर्चना के साथ झंडा चढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि मंदिर पर माता की तनमन से आराधना करने वालों क ी सभी मनोकामना पूरी होती है।
मान्यता है कि शहर के यमुना तट के किनार स्थित प्राचीन काली बांह मंदिर व स्थल है जहां माता पार्वती के निर्जीव शरीर की बांह गिरी थी। कहा जाता है कि जब माता हवन कुंड में कूद गई तो भगवान शिव शंकर उनके निर्जीव शरीर को कई दिनों तक साथ लेकर घूमते रहे। इस दौरान जब वह जब इष्टकापुरी (इटावा) से होकर गुजरे तो यमुनातट के किनारे उनकी एक बांह शरीर से अलग होकर गिर गई। सती की बांह जिस जगह पर गिरी उसी स्थान को कालीबांह नाम का पवित्र स्थान माना जाना लगा और आज यहीं कालीबांह मंदिर स्थापित है।