शब-ए-बराअत यानी निजात की रात पर इबादतों का दौर चला। इबादत करने वालों से शहर के अलावा कस्बों की मस्जिदें भी गुलजार रहीं।
लोगों ने इशा की नमाज पढ़ने के बाद कब्रिस्तानों में अपने रिश्तेदारों और बुजुर्गों की कब्रों पर जाकर फातिहा पढ़ा और उनके लिए मगफिरत की दुआ मांगी। लोगों ने मसजिदों में इबादत कर रो रोकर अल्लाह से अपने गुनाहों को माफ करने के लिए दुआ मांगी। शहर के कई स्थानों पर जलसे भी हुए।
इस दौरान उलमा ने नबी की सुन्नत पर अमल करने पर जोर दिया। इसके अलावा लोगों ने घरों में हलवा बनाकर फातिहा भी कराया। शब के माने रात और बराअत के माने निजात (छुटकारे) के होते हैं।
इसीलिए इस्लामी कैलेंडर के नौवे महीने शाबान की 14 तारीख की रात को शब-ए-बराअत कहते हैं। इस रात की काफी अहमियत है। इस रात को इबादत कर अल्लाह से जो भी दुआ मांगता है वह कुबूल होती है।
शहर में बाइस ख्वाजा, मोर वाला तकिया, स्टेशन रोड कब्रिस्तान, मोहम्मद अली सैयद, पक्का तालाब कब्रिस्तान, मेवाती मोहल्ला कब्रिस्तान, कब्रिस्तान अरविंद पुल, तकिया आजाद खां, महेरा चुंगी, सरैया चुंगी आदि में लोगों ने जाकर अपने बुजुर्गों की कब्रों पर फातिहा पढ़ा और उनके लिए मगफिरत की दुआ मांगी।
हजरत अबुल हसन शाह वारसी, भोलन सैयद, बेहड़ वाले सैयद की दरगाह पर भी लोगों ने जाकर फातिहा पढ़ा। जीआईसी ग्राउंड, इस्लामियां इंटर कालेज समेत अन्य स्थानों पर जलसे भी किए गए। शहर के कई क्षेत्रों में कुरानख्वानी का भी एहतेमाम किया गया।