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महंगाई अब मरने के बाद भी नहीं छोड़ रही पीछा

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फोटो संख्या 08- अंतिम संस्कार में प्रयोग आने वाली लकड़ी भी हो गई महंगी।
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दुकानदारों ने महंगा किया सामान, नहीं मिल रही आम की लकड़ी
फ्लैग : संकट: आरा मशीनों और टालों पर नहीं मिल रही है आम की लकड़ी
हेडिंग : बबूल की लकड़ी हो रहा अंतिम संस्कार
क्रासर
अंतिम संस्कार सामग्री भी हो गई दोगुना महंगी
संवाद न्यूज एजेंसी
बकेवर। कोरोना महामारी और अन्य बीमारियों से मौतों का आंकड़ा बढ़ने के कारण अंतिम संस्कार के लिए आम और पीपल की लकड़ी की नहीं मिल पा रही है। मजबूरी में लोग अपने स्वजनों का अंतिम संस्कार बबूल की लकड़ी से कर रहे हैं। अंतिम संस्कार सामग्री के दाम भी कई गुना बढ़ गए हैं।
लखना में आरा मशीन चलाने वाले राम औतार ने बताया कि इस समय आम की लकड़ी नहीं मिल रही है। लोग अंतिम संस्कार के लिए बबूल की लकड़ी ले जा रहे हैं। प्रतिदिन दो से तीन शवों के लिए उनके यहां से लकड़ी जाती है। बकेवर, महेवा, अहेरीपुर के टालों और आरा मशीनों पर भी आम की लकड़ी उपलब्ध नहीं है। कहीं थोड़ी आम की लकड़ी है भी तो उसका मूल्य सात सौ से आठ सौ रुपये प्रति क्विंटल है। बबूल की लकड़ी भी 600 रुपये प्रति क्विंटल में मिल रही है। बबूल की लकड़ी के साथ कुछ आम की लकड़ी चिता के लिए ले ली जाती है।
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इसके अलावा अंतिम संस्कार सामग्री भी महंगी हो गई है। कुछ दिनों पहले तक दुकानदार पूरी सामग्री 800 रुपये में दे देते थे, अब 1500 रुपये ले रहे हैं। 60से 100 रुपये में मिलने वाला कफन 100 से 200 रुपये का हो गया है। अर्थी के लिए हरे बांस के दाम भी दो से ढाई गुना बढ़ा दिए गए हैं। बांस को ढाई सौ रुपये तक में बिक रहा है।
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फोटो संख्या 20: सुखराम।
घाट पर पहुंच रहे 10 से 15 शव
बकेवर। टकरूपुर और डिभोली यमुना घाट पर हर रोज करीब 10 से 15 शव अंतिम संस्कार के लिए आ रहे हैं। पिछले सप्ताह तो शवों की संख्या 20 से 35 तक पहुंच गई थी। डिभोली में दुकान चलाने वाले सुखराम ने बताया कि यमुना नदी के दोनों के घाटों पर प्रतिदिन 10 से 15 शवों के अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं। कभी कभी संख्या अधिक भी हो जाती है।
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