टावा सफारी पार्क में विचरण करते शेर ( फाइल फोटो)।
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इटावा सफारी पार्क में कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण से जूझती शेरनी ग्रीष्मा के काम न तो देशी इलाज आया और न ही विदेशी विशेषज्ञों का हुनर। आईवीआरआई के साथ ब्रिटेन और अमेरिकन विशेषज्ञों की सलाह पर लगातार चल रहे इलाज के बीच ग्रीष्मा का जीवन समाप्त हो गया। इसमें एक खास बात जो सामने आई वह ये कि पशु विशेषज्ञों के अनुसार कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण की चपेट में आए जानवर की एक माह के अंदर ही मौत हो जाती है। लेकिन उच्चस्तरीय इलाज से ग्रीष्मा को सफारी प्रशासन चार माह से अधिक समय तक जीवित रखने में कामयाब रहा।
शेरनी ग्रीष्मा 3 जुलाई को अचानक ही कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण की चपेट में आ गई थी। जिसके बाद उसे तुरंत ही सफारी के वेटनरी अस्पताल में पहुंचाकर इलाज शुरू कर दिया गया। ब्लड सैंपल में संक्रमण की पुष्टी के बाद देश भर के पशु विशेषज्ञों के साथ अमेरिकी विशेषज्ञों को भी उसके इलाज के लिए बुलाया गया था। लेकिन इसके बाद भी ग्रीष्मा की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। ग्रीष्मा को बेहतर इलाज दिए जाने के लिए देश के साथ साथ अमेरिकन पशु विशेषज्ञों से सलाह ली गई। यही नहीं लंदन, वियाना के पशु विशेषज्ञों की सलाह पर भी ग्रीष्मा को इलाज दिया गया, लेेकिन कुछ भी ग्रीष्मा के काम नहीं आया। ग्रीष्मा उस समय कैनाइन डिस्टेंपर की चपेट में आई जब लंदन के डाक्टर जौनाथन क्रै कनेल, लंदन के प्रशिक्षक मार्क किंग्सटन जोन्स और क्रिस्टोफर जॉन हेल्स सफारी के कर्मचारियों व कीपरों को स्वस्थ रखने के गुर सिखा चुके थे। यही नहीं इसके लिए शेरों के बाड़े में उनके खेलने कूदने के लिए तमाम इंतजाम भी किए जा चुके थे। वहीं आस्ट्रेलिया वियना के पशु विशेषज्ञ डा नोवार्ड नटनी भी ग्रीष्मा का हाल लेकर डाक्टरों को सलाह दे चुके थे। ग्रीष्मा के इलाज में सफारी प्रशासन ने किस कदर एड़ी चोटी का जोर लगाया इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीडीग्रस्त होकर गंभीर हालत में पहुंची शेरनी को 3 जुलाई से 7 नवंबर जीवित रखने का प्रयास किया।