क्षेत्र के तार वाले बाबा पीपल आश्रम पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में कथावाचक अभिलाष शास्त्री ने कहा कि भगवान को पाने के लिए प्रहलाद बनना जरूरी है। अगर प्रहलाद जैसी भक्ति अपने मन में रखोगे तो नारायण दर्शन जरूर देंगे।
उन्होंने कहा कि जब असुरराज हिरणाकश्यप विजय प्राप्त करने के लिए तपस्या में लीन था तो मौका देखकर देवताओं ने उसके राज्य पर कब्जा कर लिया। उसकी गर्भवती पत्नी को देवर्षि नारद अपने आश्रम में ले आए। वह उसे प्रतिदिन धर्म और विष्णु महिमा के बारे में बताते।
यह ज्ञान गर्भ में पल रहे प्रहलाद ने भी प्राप्त किया। बाद में असुरराज ने ब्रह्मा के वरदान से तीनों लोक में विजय प्राप्त की तो रानी उसके पास आ गई। बाद में प्रहलाद का जन्म हुआ। बाल्यावस्था में ही प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति शुरू कर दी तो हिरणाकश्यप ने प्रहलाद को विष देने का आदेश दिया।
तलवार से प्रहार किया, पर्वत से नीचे फेंका गया। विषधरों के सामने फेंका गया और अंत में होलिका की गोद में बैठाकर उन्हें मारना चाहा, पर होलिका जल गई और प्रहलाद का बाल बांका तक न हुआ। अंत में उसने स्वयं प्रहलाद को मारना चाहा तो खुद भगवान विष्णु ने नरसिंह का रूप लेकर हिरणाकश्यप का वध किया।
शास्त्री जी ने कहा कि भगवान का भक्त के लिए असीम प्रेम है। अगर भक्त सच्चे मन से भगवान को पुकारे तो भगवान तुरंत दौड़े चले आते हैं। सच्चा भक्त प्रभु के प्रत्येक विधान में दया का दर्शन करता रहता है। प्रभु तो दया और न्याय के समुद्र हैं।
उन्होंने कहा कि हमको मानव जीवन भगवान का बनने के लिए प्राप्त हुआ है। हम वास्तव में भगवान के हैं पर हमने अपने को काम क्रोध आदि का गुलाम बना रखा है। यही मूर्खता है। जो भगवान का बना, उसका जीवन सार्थक, जो जगत का बना उसका जीवन सार्थक नहीं निरर्थक है। कथा का आयोजन हरिनामदास महात्यागी बटेश्वर वाले कर रहे हैं। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा का रसपान कर रहे हैं।