इटावा। किसानों और यातायात को छुट्टा गोवंश की मुसीबत से छुटकारा दिलाने जिले में सवा तीन करोड़ से अधिक लागत में गोशालाएं बनवाई गईं, लेकिन गोवंश की दिक्कत से छुटकारा नहीं मिल पाया। अधिकारियों की लापरवाही से 167 में 135 गोशालाएं बंद पड़ी हैं और हजारों की संख्या में गोवंश छुट्टा घूम रहे हैं। बंद गोशालाओं पर लोगों ने कब्जा करना भी शुरू कर दिया है।
प्रदेश शासन ने छुट्टा गोवंश को आश्रय देने के लिए नगरों और गांवों में पशु आश्रय स्थल बनवाने के निर्देश दिए थे। जिला प्रशासन ने सभी आठ ब्लाकों और चार निकायों में 168 आश्रय स्थलों बनाने का फैसला लिया। आश्रय
स्थल निर्माण के लिए मत्स्य मद से प्रत्येक गोशाला के लिए दो लाख रुपये जारी किए गए। गांवों में गोशाला निर्माण की जिम्मेदारी बीडीओ और निकायों में ईओ को सौंपी गई है। संचालन से लेकर चारे तक की व्यवस्था भी इन्हीं अधिकारियों को करनी है। करीब एक साल पहले 167 गोशालाएं बनकर तैयार हो चुकी थीं, बसरेहर ब्लॉक के बीना गांव में एक गोशाला निर्माणाधीन है। इन 167 गोशालाओं में केवल 33 ही संचालित की जा रही हैं। 32 प्रशासन चला रहा है जबकि सैफई की एक गोशाला बाबा सत्यनारायण चंदा करके चला रहे हैं। इनमें करीब साढ़े पांच हजार गोवंश बंद हैं। 20 हजार से अधिक गोवंश छुट्टा घुम रहे हैं। नगरपालिका भरथना, जसवंतनगर और नगर पंचायत बकेवर में एक-एक गोशाला संचालित है जबकि इकदिल नगर पंचायत की बंद पड़ी है।
बसरेहर ब्लॉक के नगला छती निवासी मुन्नू चौहान, मलूपुरा गांव निवासी शिव सिंह, भरथना ब्लॉक के अकूरपुरा राजन सिंह, कुशगंवा निवासी पियूष नारायण दुबे, मूंज गांव निवासी चंद्रकिशोर और कामेद गांव निवासी रामबाबू ने कहा कि छुट्टा गोवंश फसलों को तो नुकसान पहुंचा रहे हैं सड़क हादसों को भी अंजाम देरहे हैं। इन किसानों का कहना था कि प्रशासन बंद पड़ी सभी गोशालाएं संचालित कर गोवंश को बंद कराए। अधिकारी नेताओं की तरह मीटिंगों में केवल भाषणबाज न करें।
बंद पड़ी गोशालाओं पर ग्रामीण कब्जे भी करने लगे हैं। बसरेहर ब्लॉक की ग्राम पंचायत उनवा संतोषपुर की गोशाला नगला बरी गांव में बनी है। इस गोशाला में प्रधान के बटाईदार राजेंद्र सिंह ने कब्जा कर रखा है। वह इसमें अपने गायें बांधता है और पुआल भर रखी है। इसी तरह जसवंतनगर ब्लॉक की ग्राम पंचायत कैस्त की गोशाला में ग्रामीणों ने कब्जा कर लिया है। इस गोशाला के टिनशेड में ग्रामीणों ने बाजरे की करब और अपना चारा भर रखा है। परिसर में ग्रामीण जानवर बांधने के साथ कंडा पाथ कर भिटा लगा रहे हैं। प्रधान जानकी
प्रसाद ने कहा कि जगह न होने के कारण राजेंद्र सिंह अपने गोवंश बांध रहा है, वहां किसी तरह का कब्जा नहीं है।
सराय ईसर गांव के प्रधान और कांग्रेस जिलाध्यक्ष मलखान सिंह यादव ने कहा कि गोशाला के नाम पर विकास का पैसा बर्बाद किया जा रहा है। गोशालाएं बनाई गई हैं तो उन्हें चलाया जाए ताकि किसानों को छुट्टा गोवंश की समस्या से छुटकारा मिले। दो लाख में गांव की कम से कम एक गली या दो नालियां बन सकती थीं।
जसवंतनगर ब्लॉक की अंडावली गांव के प्रधान अविनाश कुमार ने बताया कि उनके यहां लंबे समय से गोशाला बनकर तैयार है लेकिन इसमें गोवंश नहीं रखे गए हैं। पैसा बेकार गया है, यही पैसा गांव के विकास में खर्च होता तो ग्रामीणों को राहत मिलती। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी नेता और बलरई गांव के प्रधान चन्द्र पाल सिंह गोशालाओं का पैसा अगर गांव में अन्य विकास कार्यों में लगता तो बेहतर होता। गोशालाएं बनाकर उन्हें न चलाना पैसे की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है। भाजपा नेत्री और नगला तौरा की प्रधान संध्या तोमर ने कहा कि गोशाला निर्माण में 5 लाख रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। ये पैसा गांव के विकास के लिए आया था। गोशाला में कुछ समय गोवंश रखे गए। चारे के कमी से अब गोवंश नहीं हैं। इतनी पैसे में गांव में काफी विकास कार्य हो जाता।
सैफई के बीडीओ को ये जानकारी नहीं है कि उनके ब्लॉक में कितनी गोशालाएं बनाई गई हैं और कितनी संचालित हैं। उपायुक्त डीसी एनआरएलएम बृजमोहन अंबेड के पास सैफई ब्लॉक का प्रभार है। उनसे गोशालाओं के बारे में पूछा गया तो कहा कि मुझे कोई जानकारी नहीं है। गोशालाएं देखना या संचालित करना मेरा काम नहीं है, ये जिम्मेदारी पशुपालन विभाग की है।
गोशालाओं के निर्माण से लेकर संचालन तक की जिम्मेदारी संबंधित ब्लॉक के बीडीओ और निकाय के ईओ की है। चारे का पैसा ही हमारा विभाग मांग पर बीडीओ और ईओ को देता है। अब निकायों के पास सीधे शासन से पैसा आने लगा है। छुट्टा गोवंश पकड़कर बंद कराने की जिम्मेदारी भी ब्लॉकों के बीडीओ और ईओ की ही है। पशुपालन विभाग के डॉक्टरों को गोशालाओं में बंद गोवंश की जांच करने, बीमारी होने पर इलाज करने की है।
- डॉ. डीके शर्मा, जिला पशु चिकित्साधिकारी