हिंदी के सारस्वत सम्मान समारोह में जहां एक ओर हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े मनीषी सम्मानित हुए। वहीं मौजूदा परिवेश में हिंदी की स्थिति पर चिंतन भी हुआ। मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति पंकज मित्तल ने कहा कि हिंदी विश्वयात्रा पर निकल पड़ी है। अब विजयश्री पाकर ही लौटेगी।
उन्होंने मैकाले की शिक्षा पद्धति को हिंदी के विकास में सबसे नुकसान दायक बताया। यह पद्धति सृजनात्मक न होकर ब्रिटिश शासन से प्रायोजित रही। आज हमें ऐसी शिक्षा की जरूरत है, जो हमारी संस्कृति से जोड़ सके। समारोह अध्यक्ष पूर्व राज्यपाल टीएन चतुर्वेदी ने कहा कि वह अंग्रेजी के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अंग्रेजी का वर्चस्व नहीं रहना चाहिए।
विद्यालयों की भाषा मातृभाषा होनी चाहिए। गीतकार डॉ. कुंवर बेचैन ने कहा कि यदि व्यक्ति भाषा के बजाय स्वर में खो जाएं तो भाषा विवाद समाप्त हो सकता है। स्वर ही आत्मा का संगीत होता है। उन्होंने कहा कि लोकरंजन को लोक रंज नहीं बनने देना चाहिए।
तमिलनाडु के हिंदी लेखक डॉ. नागेश्वर सुंदरम ने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी के विरोध होने की बात कही जाती है। जबकि यह महज राजनैतिक षड्यंत्र है। वहां भी लोग तेजी से हिंदी सीख रहे हैं। दक्षिण भारत के हिंदी इतर भाषी को उत्तर भारत में सम्मानित करने से अच्छा संदेश जाता है।
ऐतिहासिक उपन्यासकार मेवाराम ने एक शोधार्थी के तौर पर कड़ी मेहनत के बाद भी पुस्तक के संयोजन एवं प्रकाशन में आने वाली परेशानी को उकेरा। उन्होंने प्रकाशन के लिए लंबित पड़े उपन्यास का भी जिक्र किया। जिस पर टीएन चतुर्वेदी ने उन्हें आश्वस्त भी किया कि वह इस संबंध में राज्यपाल से बात करेंगे।
डॉ. कृष्ण कुमार ने कहा कि मैकाले शिक्षा पद्धति से भारत में अंग्रेजीयत बढ़ती जा रही है। जब तक हर भारतीय भाषा का सम्मान नहीं होगा, तब तक भारत एक नहीं होगा।
सर्दी के बावजूद जुटे लोग
कंपकंपाती सर्दी के बावजूद कार्यक्रम में काफी लोग जुटे। हालांकि कवर्ड पंडाल होने की वजह से अंदर बैठे लोगों को सर्दी का अहसास बाहर की अपेक्षाकृत कुछ कम रहा। विदेश से आए डा. कृष्ण कुमार ने तो अपने संबोधन में इसका अहसास भी करा दिया। बोले मैं ठंडे प्रदेश से आया हूं, फिर भी यहां आकर उनकी टांगें कांप रही हैं। उपस्थित लोगों से कहा कि आप लोग कैसे बैठे हैं। उन्हें ताज्जुब है।