लॉयन सफारी के इकलौते शावक पर की जा रही मेहनत अपना रंग दिखाने लगी है। चार शावकों की मौत का सदमा झेलने के बाद सफारी प्रशासन इकलौते नर शावक को बचाने में पूरी दमखम लगाए हुए है।
डाक्टरों की मानें तो एक सप्ताह गुजरने पर काफी हद तक खतरा टल चुका है। महीने भर बाद शावक के जिंदा रहने की उम्मीदें 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। फिलहाल यह शावक अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है। उसे फीडिंग के बाद वॉकिंग कराई जाती है। हालांकि उसने अभी आंखें नहीं खोली हैं। पलकों का उभार अवश्य दिखने लगा है।
एक-दो दिन में आंखें खुलने की भी उम्मीद है। सफारी में शेर और शावकों की मौत से जो गमगीन माहौल पैदा हुआ था। वह अब छटने लगा है। प्रमुख वन संरक्षक रूपक डे अभी भी यहां डेरा डाले हुए हैं। सबकी नजरें एक मात्र बचे नन्हे शावक पर केंद्रित हैं। यह रविवार को 13 दिन को हो गया।
पिछले दो दिनों से यह अपने पैरों पर खड़ा भी होने लगा है। डाक्टर की मदद से वह चलने लगा है। यह तब जबकि उसने अभी अपनी आंखें नहीं खोली है। सूत्रों की मानें तो उसकी पलकों का उभार दिखने लगा है। वह दो दिन में आंखें खोल सकता है।
जन्म के समय शावक का जन्म सिर्फ 1008 ग्राम था। जो बढ़कर 1304 ग्राम हो गया है। यानि करीब 300 ग्राम वजन बढ़ चुका है। दूध की खुराक भी 35 एमएल से बढ़कर 45-50 एमएल तक हुई है।
पिछले दो दिनों से उसे गाय के दूध की जगह अमूल का दूध दिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार सप्ताह भर गुजरने से खतरे जैसी स्थिति टल चुकी है। एक महीने के बाद शावक 90 फीसद तक सेफ हो जाएगा।
डा. कड़ीवाल के टिप्स कारगर
इन दिनों सफारी में शावक को बचाने के लिए गुजरात से बुलाए गए डा. कड़ीवाल के टिप्स ही काम कर रहे हैं। हालांकि देखभाल की जिम्मेदारी अकेले डा. अरविंद त्रिपाठी उठा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि लखनऊ चिड़ियाघर से आए डाक्टरों ने तो यहां के माहौल को बिगाड़ दिया था। सफारी के डायरेक्टर केके सिंह ने भी अभी वापसी नहीं की है। प्रमुख वन संरक्षक रूपक डे इसी से लगातार यहां मौजूद हैं। रविवार को श्री डे से संपर्क का प्रयास किया। मगर उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
अब शेरनी से दूर ही रहेगा शावक
जन्म देने के बाद शेरनी ग्रीष्मा ने शावक को छोड़ दिया था। तब से उसकी देखरेख डा. कड़ीवाल की टिप्स के अनुसार सफारी चिकित्सक डा. अरविंद त्रिपाठी कर रहे हैं।
एक बार छोड़ देने पर शेरनी उसे मार सकती है। चूंकि शावक करीब छह माह तक शेरनी का दूध पीता है। ऐसे में आगे फीडिंग को लेकर कोई भी फैसला शासन स्तर पर ही लिया जाएगा।
हालांकि सूत्र बताते हैं कि शावक को अब दोबारा शेरनी के पास नहीं रखा जाएगा। शावक को स्वीकारना और अस्वीकार करना शेरनी के स्वभाव पर निर्भर है। ऐसे में सिर्फ पांच फीसदी कामयाबी मिलने की उम्मीद रहती है। लेकिन स्थिति रिस्क उठाने लायक नहीं है।
बीमारी से जूझने को हुए जतन
शावक को शेरनी का दूध नसीब न होने से उसमें प्रतिरोधक क्षमता के प्रभावित होने का अंदेशा बना हुआ है। लेकिन सूत्र बताते हैं कि जन्म के दूसरे दिन शेरनी को पिजड़े में बंद करके शावक को दूध पिलाने का प्रयास किए गए लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद सफारी प्रशासन ने फीडिंग के ऊपरी जतन शुरू किए थे।
ग्रीष्मा शेरनी के खून का आधा एमएल सीरम शावक को पिलाया गया था। इतने ही एमएल सीरम का इंजेक्शन उसकी खाल में लगाया गया था। साथ ही उसे 36 घंटे पूर्व बच्चा देने वाली गाय का कोलेस्ट्राल दिया गया है। यह सब रोग से लड़ने की क्षमता विकसित करने के लिए किया गया।