इटावा। जिले में पूसा बासमती चावल की पांचों किस्मों का जीआई टैग (भौगोलिक संकेत) के लिए चयन किया गया है। इससे अब देशभर में इसे पहचान मिलेगी। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मुनाफा होने से किसानों का रुझान बढ़ने से इसका रकबा भी बढ़ेगा।
जिले में लगभग 43 हजार हेक्टेयर धान का रकबा है। इसमें सात हजार हेक्टेयर में बासमती चावल पैदा किया जाता है। मौसमी प्रकोप और अच्छे दाम न मिल पाने की वजह से ज्यादातर किसान हाईब्रिड चावल को प्राथमिकता देते हैं। अब बासमती चावल को जीआई टैग मिलने से कृत्रिम रंग और कृत्रिम सुंगध से चावल निर्मित कर बासमती के नाम पर बेचने पर भी रोक लगेगी। घरेलू बाजार में प्रीमियम बासमती की गुणवत्ता उच्च रहेगी।
नाम पर नहीं होगा फर्जीवाड़ा
बासमती चावल की प्राकृतिक सुगंध को पहचान मजबूत करने के लिए कृत्रिम रंग, पॉलिशिंग एजेंट और कृत्रिम सुगंधों के प्रयोग पर सख्ती से रोक लगेगी। पकाने के बाद बढ़ाव का अनुपात, नमी की अधिकतम सीमा और औसत आकार को तय किया जाएगा। प्राधिकरण की टीम जगह-जगह नमूने लेगी। नियमों के उल्लंघन पर संबंधितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का भी प्रावधान बनाया गया है।
एक एकड़ की फसल में 35 हजार का मुनाफा
प्रगतिशील किसान रामकरन तिवारी ने बताया कि वह लगभग 10 साल से बासमती चावल की खेती कर रहे हैं। उन्होंने पूसा बासमती (पीबी) 1121 किस्म से इसकी पहली बार शुरुआत की थी। इसके बाद पीबी 1692 और पीबी 1847 किस्म का बासमती चावल पैदा किया। 30 एकड़ में खेती की थी। प्रति एकड़ लगभग 15 हजार रुपये की लागत आई थी। इससे निकलने वाला चावल बेचकर 35 हजार रुपये का मुनाफा कमाया। उन्होंने बताया कि जिले में कुछ किसान पीबी 1718, पीबी 1509 किस्म का बासमती चावल पैदा करते हैं। बासमती चावल दो हजार से चार हजार क्विंटल तक बिकता है।
जीआई टैग में जिला शामिल होने के बाद यहां के बासमती चावल को देश में पहचान मिलेगी। इससे गुणवत्ता में सुधार आएगा। किसानों का रुझान बढ़ने से इसका रकबा बढ़ने की भी उम्मीद है। - कुलदीप राणा, जिला कृषि अधिकारी