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Etah News: मलेशिया की तुलसी और केरल की कॉफी से महक रहा बाग

Sun, 15 Sep 2024 01:37 AM IST
आगरा ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
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एटा। अलीगंज कस्बे के रहने वाले डॉ. योगेश जैन का व्यवसाय तो भले ही शिक्षा संबंधी है, लेकिन औषधियाें की ललक इस दिशा में लगातार आगे बढ़ा रही है। स्वयं के अध्ययन से वह शोध कर रहे हैं और वर्तमान में उनका बाग मलेशिया की तुलसी, केरल की कॉफी की खुशबू से महक रहा है। कुल मिलाकर 70 औषधीय पौधे उनके तीन बीघा के बाग में हैं।
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योगेश जैन ने दर्शन शास्त्र से पीएचडी किया। कई किताबें लिख चुके हैं। लेकिन रुचि औषधियों में है। उनके पिता वैध थे और उनके साथ ही योगेश जैन ने औषधियों का महत्व व प्रयोग समझा। लेकिन इससे भी आगे बढ़कर मन में जिज्ञासा भी हुई कि अधिकांश औषधियों को बाहर से ही क्यों मंगाया जाता है, इन्हें हम अपने खेतों में क्यों नहीं कर सकते। इसी सवाल के समाधान की दिशा में आगे बढ़े और राई रोड स्थित अपने 3 बीघा खेत को बाग का रूप दे दिया। तमाम कृषि संबंधी किताबें जुटाईं और पढ़कर शोध करने लगे। दूसरे प्रांतों से विशेष औषधीय बीज मंगाकर लगाना शुरू किए। कुछ बढ़े तो पुष्टि हो गई कि हमारी जलवायु में भी ये औषधीय खेती हो सकती है। संवाद

इन औषधियों की हो रही खेती
काली तुलसी, इंसुलिन, छोटी पीपल, कपूर, सफेद मूसली, पुत्रजीवनी, गुलमर्ग, आंवला, तेजपात, दालचीनी, आदि की खेती की जा रही है। उन्होंने महाराष्ट्र, गोरखपुर, चित्रकूट, केरल आदि स्थानों से इनके बीज मंगाए थे। बताते हैं कि वह व्यवसायिक रूप से पैदावार नहीं करते हैं। शोध करके सिद्ध करना चाहते हैं कि यहां कौन सी औषधियां हो सकती हैं, जिससे कि क्षेत्र के किसान इस पर भरोसा कर सकें।
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तंबाकू से मिल सकता है छुटकारा
छोटी पीपली का आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में काफी महत्व है। यह काफी महंगी भी बिकती है। डॉ. योगेश बताते हैं कि इस क्षेत्र की जलवायु में इसे आसानी से किया जा सकता है। अलीगंज क्षेत्र के किसान अधिक मुनाफे के चक्कर में जहर रूपी तंबाकू की खेती करते हैं। जबकि पीपली इससे अधिक आय दे सकती है। किसान इसकी पैदावार करें तो तंबाकू भूल जाएंगे। इसका बीज बार-बार नहीं डालना पड़ता। एक बार बीज लगा दो तो यह स्वयं बढ़ती रहती है।

परंपरागत खेती से कई गुना अधिक आय
डॉ. योगेश क्षेत्र के किसानों को अपने बाग में बुलाकर औषधीय खेती की विधि समझाते हैं। बताते हैं कि किन औषधियों को यहां पैदा किया जा सकता है। इन औषधियों की पैदावार करने में परंपरागत खेती से दो से तीन गुना तक अधिक आय हो सकती है।
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