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चार साल से नहीं हुआ मृदा परीक्षण, कमजोर हुई मिट्टी की सेहत

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मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में रखी हुईं मशीनें।संवाद - फोटो : ETAH
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एटा। अच्छे उत्पादन और मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए सरकार मृदा परीक्षण पर खासा जोर देती है। जिले में इसके लिए प्रयोगशाला भी बनी हुई है, लेकिन इसमें चार साल से परीक्षण नहीं हो रहे। बजट न मिलने की बात कहकर लैब अस्थायी रूप से बंद कर दी गई है। ऐसे में किसानों को पता ही नहीं लगता कि उनके खेत की मिट्टी में कौन से तत्व कम या ज्यादा हैं। जिससे कि उसके निवारण के लिए उर्वरकों का प्रयोग किया जाए।
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शहर के नन्नूमल चौराहा स्थित राजकीय कृषि रक्षा इकाई में मृदा परीक्षण की प्रयोगशाला स्थित है, जो चार से बंद पड़ी हुई है। यहां पर वित्तीय वर्ष 2015-16 में सरकारी की एनएमएसए योजना के तहत किसानों के खेत की मिट्टी का परीक्षण निशुल्क शुरू कराया गया। साल 2018 में मृदा परीक्षण बंद हो गए और प्रयोगशाला शोपीस बनकर रह गई। वर्तमान में यहां उपलब्ध लाखों रुपये की मशीनें धूल फांक रही हैं।
किसानों को जागरूक नहीं कर पाया महकमा
जब प्रयोगशाला संचालित थी, उस समय भी मृदा परीक्षण के लिए महकमा किसानों को जागरूक नहीं कर पाया। जिसके चलते काफी कम किसान प्रयोगशाला तक पहुंचे। प्रयोगशाला के प्रभारी शशिकांत कुमार राजपूत ने बताया कि 2015 से 2018 तक करीब तीन सौ जांचें ही हुईं। जबकि साल 2018 के बाद से जांच बंद ही हो गईं।
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आधे से भी कम रह गया कार्बनिक पदार्थ
कृषि विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र सिंह ने बताया कि जिले की मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ के तत्व बहुत कम हो गए हैं। मानक के अनुसार मिट्टी में कार्बनिक तत्व 0.81 से 1 प्रतिशत तक होना चाहिए। लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र के द्वारा की गई हाल की जांच के अनुसार यह 0.2 से 0.32 प्रतिशत तक ही रह गए हैं। इसी तरह मानक के अनुसार जिंक 1.20 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) तक होना चाहिए। लेकिन इसमें 0.4 पीपीएम तक ही तत्व रह गए है। वहीं बोरॉन 0.50 पीपीएम तक होना चाहिए, जो 0.2 पीपीएम ही रह गया है।
किसानों को जागरूक होने की जरूरत
कृषि विशेषज्ञ गौरव प्रताप सिंह ने बताया कि किसानों द्वारा मृदा परीक्षण को लेकर जागरूक होने की जरूरत है। मिट्टी में पाए जाने वाले कम तत्व को लेकर वैज्ञानिक तरीके से समाधान के प्रयास होने चाहिए। लेकिन जागरूकता और जानकारी के अभाव किसान मनमाने तरीके से खेत में यूरिया लगाता रहता है। किसान ध्यान नहीं देगा तो मिट्टी की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो जाएगी।
जांच कराने पर खर्च करने पड़ते हैं 298 रुपये
कृषि विभाग की प्रयोगशाला में किसानों के लिए मृदा परीक्षण पूरी तरह निशुल्क रखा गया था। जबकि इसी जांच के लिए बाजार में खासी रकम चुकता करनी पड़ती है। कृषि विज्ञान केंद्र अवागढ़ के विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र सिंह ने बताया कि किसानों को मृदा परीक्षण कराने के लिए 298 रुपये प्रति सैंपल खर्च पड़ते हैं।
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