घिलौआ स्थित कारगिल शहीद पुष्पेंद्र यादव की समाधी स्थल
- फोटो : ETAH
एटा। प्रशासनिक अनदेखी के चलते कारगिल शहीद का समाधिस्थल वीरान पड़ा है। बबूल की झाड़ियों के बीच बने समाधिस्थल तक पहुंचना दुष्कर कार्य है। प्रशासन अभी तक कारगिल शहीद पुष्पेंद्र के समाधिस्थल तक जाने के लिए रास्ता उपलब्ध नहीं करा सका है।
गांव धिलौआ निवासी कारगिल शहीर पुष्पेंद्र कुुमार यादव वर्ष 1999 में कारगिल में दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। शहीद के अंतिम संस्कार में तमाम जनप्रतिनिधि और आला अधिकारी शामिल हुए। इस दौरान परिजनों को आश्वस्त किया गया कि गांव का विकास कराया जाएगा।
शहीद की प्रतिमा और गेट बनवाया जाएगा लेकिन 22 साल बाद भी यहां न तो गेट बना और न ही शहीद की प्रतिमा लग सकी है। यहां तक की समाधि स्थल तक जाने का रास्ता भी प्रशासन नहीं बनवा सका है। ऐसे में कारगिल विजय दिवस और राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी पर महज शहीद के परिजन ही शहीदस्थल पर पुष्पार्चन करने पहुंचते हैं।
गिरधारी पोस्ट पर तैनात थे पुष्पेंद्र:-गांव धिलौआ निवासी शोभाराम और उनकी पत्नी शांति देवी के छोटी बेटे पुष्पेंद्र ने वर्ष 1997 में सेना ज्वाइन की। वह 18 कुमायूं रेजीमेंट में थे। कारगिल के युद्ध के समय पुष्पेंद्र की तैनाती हनीफ सेक्टर स्थित गिरधारी पोस्ट पर थी। यहां 30 अगस्त 1999 को दुश्मनों से लोहा लेते हुए वह शहीद हो गए।
प्रशासन तब भी नहीं दे सका था जमीन:-शहीद होने के बाद पुष्पेंद्र का पार्थिव शरीर गांव आया तो ग्राम समाज की सार्वजनिक भूमि प्रशासन अंतिम संस्कार के लिए उपलब्ध नहीं करा सका। इस पर परिजनों ने ही अपने खेत में जमीन दी थी। वर्तमान में इसकी चारदीवारी के साथ गेट चढ़ा है और अंदर समाधि बनी है, जहां शिलापट्ट लगा है। प्रशासनिक अनदेखी के चलते यहां शहीद की प्रतिमा तक नहीं लग सकी है।
उम्मीद छोड़ी
कारगिल शहीद छोटे भाई पुष्पेंद्र के समाधि स्थल तक सड़क बनवाने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार प्रार्थना पत्र दे चुके हैं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। पिछले 20-22 वर्षों में प्रशासन के रुख के चलते अब उम्मीद ही छोड़ दी है।
शिव कुमार यादव, शहीद पुष्पेंद्र के भाई