दशकों तक जिले को खाद्यान्न, भूगर्भ जलस्तर एवं जलनिकासी के रूप में स्वच्छता की सौगात देने वाली ईशन नदी आज खुद ही बदहाल है और अपनी पहचान होती जा रही है। मानसून के दिनों में उफान पर रहने वाली ईशन आज सूखी पड़ी है। पानी के नाम पर यहां घास और चंद नालियाें का गंदा पानी बचा है। अनुमान के मुताबिक यदि औसत से अधिक बारिश हुई और नदी ने उफान मारा तो पानी घरों में घुसने के अलावा लाखाें की फसल बर्बाद होगी।
दशकों से जनपदवासियों की झोली खुशियों से भरने वाली ईशन नदी को आज पहचान की दरकार है। अतिक्रमणकारियों का दंश झेल रही नदी का भूगोल बदल चुका है। नई पीढ़ी इसे नाले के रूप में पहचानती है। विभागीय उपेक्षा के चलते नदी में वर्षों से ईशन नदी में पानी ही नहीं आया। ऐसे में यह अब नाम की नदी रह गई है। खेतों की सिंचाई तो दूर अब यहां खुद ही सूखे की मार है। 10 से 15 मीटर चौड़ाई वाली इस नदी के किनारे अतिक्रमण के कारण सिकुड़ चुके हैं। आगरा रोड पर इसकी चौड़ाई पंद्रह मीटर तो दूर पंद्रह फीट भी नहीं बची है।
लोगों ने नदी के किनारे बहुमंजिला इमरात बना कर अवैध कब्जा कर लिया है। भविष्यवाणी के मुताबिक यदि इस बार औसत से अधिक बारिश हुई तो नदी का पानी उफान मार कर घरों में घुसने के अलावा आसपास के खेतों की फसल ले डूबेगा।
बीस फीट नीचे गिरा भूगर्भ जलस्तर
आगरा रोड निवासी वृद्ध राम किशोर और आशाराम ने बताया कि बीस साल पहले ईशन नदी में पानी आने के कारण आसपास इलाके में 20 से 30 फीट पर पानी मिल जता था, लेकिन आज पचास फीट पर पानी मिल रहा है। नदी में पानी नहीं होने और तालाब सूखने के कारण खेतों की नमी चली गई है। अब क्षेत्र में पानी पचास फीट पर पानी नहीं मिलता। नदी में सफाई के अलावा पानी छोड़ जाने की जरुरत है। ताकि भूगर्भ जलस्तर बढ़ सके।
पानी से लबालब रहने वाली ईशन नदी के पानी से निकटवर्ती क्षेत्र की सिंचाई होती थी। इतना ही नहीं शहर में कभी भी जलस्तर गिरने की शिकायत नहीं हुई। पानी की उपलब्धता आसान रहती थी। बारिश के दिनों में उफान पर आने वाली नदी का पानी कई बार शहर में आ जाता था। आवागमन भी प्रभावित होता था। आज नाम की नदी नाले के रूप में ही शेष बची है।
रामबहादुर सक्सेना, सेवानिवृत प्रवक्ता
दर्जनों गांवों की भूमि एवं पशुआें के लिए जीवनदायनी रही ईशन नदी इन दिनों खुद बदहाल है। भीषण गरमी में पशु नदी से प्यास तक नहीं बुझा पा रहे। वहीं प्रशासन इस पर बढ़ रहा अतिक्रमण रोकने में नाकाम है। 45 किमी लंबी नदी के किनारे एवं चौड़ाई घटती जा रही है। इसे लेकर जिलाधिकारी को ज्ञापन भी सौंपा गया है।
गजेंद्र सिंह चौहान बबलू
जिलाध्यक्ष क्षत्रिय महासभा
पुराना रिकार्ड उपलब्ध न होने के चलते इसकी भूमि एवं चौड़ाई को लेकर प्रामाणिक अभिलेख नहीं हैं। जिले में 45 किमी लंबी इस नदी की चौड़ाई दस से पंद्रह मीटर तक है। लेकिन अतिक्रमण के चलते चौड़ाई सिकुड़ कर पांच से आठ फीट बची है। नदी में सफाई के लिए कार्य योजना तैयार की जा रही है। अतिक्रमण प्रशासन को हटवाना है।
-रामकृष्ण, अधिशासी अभियंता, सिंचाई विभाग, एटा