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सरकारों की उपेक्षा का शिकार है तुलसीदास की जन्म स्थली

Fri, 21 Aug 2015 06:32 PM IST
ब्यूरो अमर उजाला, एटा
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 महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने मानस की रचना करके घर-घर में भले ही अपना स्थान बनाया, लेकिन उनका जन्म स्थान सोरों शूकर क्षेत्र होने के बावजूद सरकार ने विवादित बना दिया। केंद्र-राज्य सरकार तीर्थ नगरी सोरों को लेकर उपेक्षा यहां के बाशिंदों को शूल की तरह चुभती है। वहीं तुलसी बाबा की नगरी के लोग इस बात से भी आहत हैं कि तुलसी के जन्म के अकाट्य प्रमाणों को सरकारें नजरअंदाज कर रही हैं।
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संत तुलसीदास ने सोरों शूकर क्षेत्र में श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को जन्म लिया था। तुलसी का जन्म स्थल तीर्थ नगरी के मोहल्ला योग मार्ग पर स्थित है। तुलसी ने जहां अपने गुरु नरहरि दास से शिक्षा ग्रहण की। यह पाठशाला भी मोहल्ला चौधरी में स्थिति है। यह पाठशाला ही नहीं गुरु नरहरि दास के वंशज भी तीर्थ नगरी में मौजूद हैं। संत तुलसीदास की शादी सोरों के ही मोहल्ला बदरिया से हुई थी। उनकी पत्नी रत्नावली का मकान भी बदरिया में मौजूद है। स्वयं तुलसीदास भी रामचरित मानस की रचना करते हुए इसका जिक्र किया - मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा सो सूकरखेत, समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउ अचेत। अर्थात मैंने अपने गुरु से पुन: सूकरक्षेत्र में राम कथा सुनी लेकिन तब अत्यधिक अचेता अवस्था के कारण मैं इसे भलीभांति समझ न सका। इन अकाट्य प्रमाणों के बाद भी राजापुर में तुलसी जयंती पर रामायण मेला शासन के धन से आयोजित होता है, जबकि सोरों शूकर क्षेत्र को न तो धन आवंटित होता है और न ही तुलसी की स्मृतियों को ताजा बनाने के लिए कार्यक्रम होते हैं।  

केए कालेज कासगंज के हिन्दी प्राध्यापक डा.राधाकृष्ण दीक्षित का कहना है कि राज्य सरकार में सच्चाई का सामना करने की इच्छाशक्ति नहीं है। जबकि तुलसी के जन्म सोरों में हुआ है इसको लेकर एक नहीं अनेक प्रमाण मौजूद हैं।
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चौधरी रामप्रकाश यादव महाविद्यालय के प्रचार्य डा. सुरेंद्र अग्रवाल का कहना है कि संत तुलसीदास ने अपने ग्रंथों में ब्रज एवं अवधी भाषा का प्रयोग किया है। यह भी इस बात का प्रमाण तुलसी का जन्म स्थल सोरों ही है।

पंडित भारत किशोर दुबे का कहना है कि राजापुर को तुलसी का जन्म स्थान बनाने वाले तर्क मिथ्या से भरे हैं, साहित्य व इतिहास के प्रमाणों से सोरों ही तुलसी की जन्म स्थली सिद्ध होती है।

पालिका अध्यक्ष अर्चना पप्पू यादव का कहना है कि भले ही सरकारें तीर्थ नगरी की उपेक्षा करें, लेकिन नगर पालिका सोरों को तुलसी की जन्म भूमि मानती हैं और इसके विकास में एवं तुलसी की स्मृतियों को ताजा रखने में कोई कोर कसर नहीं रखी जाएगी।
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