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मदर्स डे : बेटा कितना भी छुपाएं परेशानी, पहचान लेती है मां...

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अमन शाक्य अपनी मां मनोज शाक्य के साथ सेल्फी लेते हुए। - फोटो : ETAH
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एटा। मां, वह शब्द है जिसमें प्यार है, मिठास है, अपनत्व है। बेटा कितना भी परेशानी छुपाए मां पहचान लेती है। मां का ममत्व पाकर जहां बेटे-बेटियों की सारी समस्याएं छू मंतर हो जाती हैं। वही उनकी गोद में सिर रखकर जो सुख और सुकून मिलता है, वह कहीं अन्यत्र नहीं। कोरोना संक्रमण के दौर में इस दिन की प्रासंगिकता कुछ ज्यादा ही हो गई है।
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लोग अपनों से दूर हैं, ऐसे कठिन दौर में मां के फोन पर दो शब्द दिल को खुशियों से भर देते हैं। जनपद में कुछ ऐसी मां भी है जो अपने बेटे से दूर हैं, लेकिन उन्हें अपने बेटे पर फख्र हैं। वैश्विक महामारी के दौर में उनका बेटा दिन-रात अस्पताल में लोगों का इलाज कर रहा है, तो सरहद पर खड़ा होकर धरती मां की रक्षा कर रहा है।
वहीं कुछ मां ऐसी भी हैं जो लाडले का घर आने के लिए इंतजार कर रही हैं। वहीं, कुछ मां ऐसी भी हैं, जिन्होंने अपने बेटे को बड़ा करके बुढ़ापे के सपने संजोए, लेकिन पूरे नहीं हो पाए और आज वह वृद्धाश्रम में अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।
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लोगों का इलाज कर रहा बेटा
मेरा बेटा विश्व विकास किसी वॉरियर्स से कम नहीं है। वह आज के वैश्विक महामारी के दौर में कोरोना से संक्रमित लोगों का इलाज कर रहा है। चाहे दिन हो या रात रोजाना अपनी ड्यूटी निभा रहा है। हालांकि भगवान की कृपा से वह सुरक्षित है।
- सरोज कुमारी
सरहद की रक्षा कर रहा लाडला
लॉकडाउन की वजह से मेरा छोटा बेटा सत्यप्रकाश घर नहीं आ पाया। लेकिन वह किसी कोरोना वॉरियर्स से कम नहीं हैं। भारतीय सेना में आजा वह सरहद पर खड़ा होकर सबसे बड़ी धरती मां की सेवा कर रहा है। बस सुबह शाम फोन उससे बात हो जाने से ही दिल को तसल्ली मिल जाती है।
- सुषमा देवी
ऐसी लाठी बनेगा पता न था
- वृद्धाश्रम में पिछले आठ महीने से रह रहे हैं, मेरा बेटा मजदूरी करता है। वह मुझे यहां आकर छोड़ गया, लेकिन आज तक वह मुझसे मिलने नहीं आया। बेटे की बहुत याद आती है। बेटे को पालकर बड़ा किया कि वह बुढ़ापे की लाठी बनेगा पर ऐसी पता नहीं था।
- मार्गश्री, वृद्घाश्रम
बेटा दो साल में मिलने नहीं आया
आजकल की बहू वृद्ध लोगों को घर में रुकने ही नहीं देती है, उन्ही की प्रत्येक जगह चलती है। बहू घर में रोटी पानी तक नहीं देती थी, इसलिए दुखी होकर वृद्धाश्रम में चली आई हूं। यहां रहते हुए दो साल हो गए लेकिन मेरा बेटा और बहू मुझसे मिलने नहीं आया है। नातियों की शक्ल भी नहीं देखी है।
- शांति, वृद्धाश्रम
मेरे दिल में रहती है मेरी मां
मेरी मां मनोज शाक्य डॉक्टर हैं, जो सुबह ड्यूटी जाती हैं और शाम को घर वापस आती हैं। कोरोना संक्रमितों का इलाज करने के कारण वे मुझे गले से भी नहीं लगातीं हैं। वह कोरोना संक्रमित लोगों का इलाज करती हैं। इसलिए मैं उनसे दूर जरूर रहता हूं, लेकिन वह मेरे दिल में हैं। वह एक कोरोना योद्धा हैं।
- अमन शाक्य
मां के काम के जज्बे को सलाम
मेरी मां रेनू शर्मा कोरोना वॉरियर्स हैं। वह अस्पताल में एएनएम के पद पर कार्यरत हैं, जो रोजाना कई लोगों का इलाज करने में जुटी रहती हैं। अपनी मां को ऐसे वैश्विक महामारी के माहौल में उनके काम के जज्बे का सलाम करता हूं। काश सभी की मां मेरी जैसी हों।
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-प्रबल मुदगल
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