इंटरनेट की रफ्तार से पिछड़े टेसू-झांझी
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टेसू अगर करे, टेसू मगर करे, टेसू लेके ही टरे के बोल अब नहीं सुनाई पड़ते। हाथ में बर्तन और टेसू लेकर घर-घर जाकर विवाह का निमंत्रण देते बच्चों की टोलियां भी नहीं नजर आतीं। इंटरनेट की रफ्तार में टेसू-झांझी पिछड़ रहे हैं। नई पीढ़ी को इस पारंपरिक खेल का महत्व ही पता नहीं है।
दशहरे के बाद शुरू होने वाले टेसू-झांझी के खेल में बच्चे घर-घर जाकर रुपये जमा करते और शरद पूर्णिमा को विवाह कराया जाता, लेकिन बदलते वक्त में अब परंपरा लुप्त होती जा रही है। मोबाइल, टीवी और इंटरनेट की रफ्तार के साथ दौड़ते बच्चे अब टेसू-झांझी के बारे में जानते ही नहीं हैं। कुंभकार परिवारों के सामने भी रोजी रोटी का संकट खड़ा कर दिया है।
मिट्टी के सामान की उपेक्षा के चलते इनके सामने मुसीबत है। पहले कुम्हार से दशहरा से कई दिन पूर्व टेसू-झेंझी तैयार कर दूसरे क्षेत्रों में बिक्री करते थे। इस बार भी उन्होंने टेसू झांझी बनाए तो मगर सीमित संख्या में। बावजूद इसके खरीदार नहीं आ रहे हैं। कुंभकार अरविंद कहते हैं कि महंगाई के कारण टेसू-झांझी की बिक्री 10 रुपए प्रति नग की जा रही है।