सकीट। आधुनिक दौर में ग्रामीण अंचल तक होली की परंपराओं में तेजी से बदलाव हुआ है। अब डीजे की धमक के आगे फाग के गीत फीके पड़ गए हैं।
दो दशक पूर्व तक लोग होली का विशेष इंतजार करते थे। गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते थे। वसंत पंचमी से होली के फाग गीत शुरू हो जाते थे। इसके साथ ही बेलवरियां खूब गाई जाती थीं। इनमें अमर शहीदों का वर्णन कर उन्हें याद किया जाता था। बच्चे कई दिन पहले से और होली के कई दिन बाद तक होली खेलते थे। लोग रिश्तेदारी में भी होली खेलने जाते थे। समय में बदलाव होने पर शहर के साथ ही कस्बा और देहात क्षेत्र में भी अब तक फाग गीत नहीं सुनाई दे रहे।
प्रधानाचार्य गौतम सिंह सराफ बताते हैं कि होली को सजाने-संवारने, डीजे बजाने का काम तो खूब हो रहा है, लेकिन फाग गीत, बेलवरियां नहीं सुनाई दे रहीं। व्यवसायी सुबोध दीक्षित ने बताया कि अब तो त्योहार पर मिलने के बजाए लोग बधाई भी फोन के माध्यम से दे देते हैं। पहले होली पर शाम से देर रात तक फाग गीत गाए जाते थे।