नोटबंदी के साथ कासगंज गल्ला मंडी में छाया सन्नाटा मिटने का नाम नहीं ले रहा है। नकदी के संकट को देखते हुए किसान अपना गल्ला सस्ते दर पर बेचने को मजबूर हो रहे हैं। वहीं किसानों का चेक से भुगतान के निर्देश हैं लेकिन बैंकों में लग रही भीड़ के कारण किसान इसे लेने की स्थिति में नहीं है।
बताया जाता है कि नोटबंदी से पूर्व गल्ला मंडी में 10 हजार क्विंटल गल्ले की रोजाना आवक थी, जो अब घट कर 500 से 800 क्विंटत रह गई है। कुछ किसान गल्ला बेचकर बड़े नोट ले रहे हैं। पर ज्यादातर किसान बड़े नोट लेने को तैयार नहीं हैं। बड़े नोट नहीं लेने वाले किसानों को उनकी उपज की सही कीमत नहीं मिल रही है। उन्हें औने-पौने दाम में बिक्री करने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है। वहीं सरकार ने गल्ला कारोबारियों को बैंक खातों से 50 हजार रुपये निकासी की सुविधा दी है, लेकिन एक सप्ताह में गल्ला खरीदना तो दूर श्रमिकों की मजदूरी का हिसाब भी 50 हजार रुपये में नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में न ही किसानों के गल्ले की बिक्री हो रही है और न बैंकों से किसान को राहत नहीं मिल पा रही है। गल्ला मंडी पहुंचे किसान उमराव ने बताया कि किसानों को गल्ला बेचने में काफी दिक्कतें हो रहीं है। मंडी में बड़े नोट मिलने पर पूरा भाव मिलता जबकि छोटे नोट लेने पर कम कीमत दी जाती है।
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दिनभर कैशलेस रहा सेंट्रल
कासगंज। शहर की सेंट्रल बैंक शाखा पर शुक्रवार को कैश न होने के कारण न चेक से निकासी हुई, न नोट ही बदले जा सके। बैंक के गेट पर यह नोटिस चस्पा कर दिया था कि बैंक में कैश नहीं है। वरिष्ठ शाखा प्रबंधक रमेश चंद्र ने बताया कि गुरुवार की साम को ही कैश खत्म हो गया था। मांग भेजी गई है।