एटा। लोकसभा चुनाव से पहले एटा संसदीय सीट पर इस बार राजनीतिक माहौल बेहद ज्यादा गरमा गया है। दो चुनाव से पूर्व सीएम के पुत्र राजवीर सिंह के सामने भले ही कोई दावेदार नहीं आया और निर्विरोध रूप से टिकट दे दी गई, लेकिन इस बार यहां से भाजपा नेत्री डिबाई की पूर्व विधायक अनीता लोधी ने ताल ठोंक दी है। भले ही टिकट अभी पक्का नहीं है, लेकिन उनकी सक्रियता ने एटा-कासगंज के सियासी फलक और भाजपा में हलचल खड़ी कर दी है।
निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में एटा लोकसभा सीट को पूर्व सीएम कल्याण सिंह ने 2009 में अपनी कर्मभूमि बनाया। सपा के समर्थन से इस सीट पर चुनाव लड़ा और जीते भी। भले ही वह उस दौर में लंबे समय से भाजपा से दूर रहे थे और 2009 के चुनाव में अपनी पार्टी को भी छोड़कर निर्दलीय हो गए, लेकिन पार्टी में वह तमाम लोगों के राजनीतिक गुरु और आदर्श थे। ऐसे में अधिकांश भाजपाई उस दौर में भी उनके खिलाफ चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोच सके। गैर राजनीतिक उम्मीदवार के रूप में पार्टी ने चिकित्सा पेशे से आने वाले डॉ. श्याम सिंह को टिकट दिया था।
चुनाव बाद कल्याण सिंह भाजपा में शामिल हो गए। 2014 के चुनाव में उनके पुत्र राजवीर सिंह ने इसी सीट पर अपनी दावेदार पेश कर दी। यह कल्याण सिंह के कद का ही असर था कि राजवीर सिंह का नाम आने के बाद अन्य पार्टी नेताओं ने अपने पैर खींच लिए। कुछ इसी तरह की सूरत 2019 के चुनाव में भी बनी और राजवीर सिंह को फिर बिना किसी विवाद और विरोध के टिकट दे दी गई।
लेकिन 2024 में राजनीतिक हालात अभी से बदलते नजर आने लगे हैं। डिबाई (बुलंदशहर) में 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी टिकट पर जीत दर्ज करा चुकीं डॉ. अनीता लोधी ने न सिर्फ टिकट मांगी है। बल्कि खुलकर राजवीर सिंह का विरोध भी जताना शुरू कर दिया है। उनका यह सियासी हौसला राजवीर सिंह के समर्थकों को रास नहीं आ रहा। एटा और कासगंज में एकछत्र राज में आए इस व्यवधान पर इस खेमे में चिंताएं पैदा हो गई हैं। विरोध केवल आंतरिक ही नहीं, मुखर रूप से भी सामने आ चुका है। बृहस्पतिवार को कासगंज में दोनों पक्षों की सीधी भिड़ंत और पुलिस तक मामला पहुंचने के बाद पार्टी के आला पदाधिकारी भी सोचने को मजबूर हो गए हैं।