महात्मा बुद्ध द्वारा स्थापित आरिषशास्त्र को शिवलिंग मानकर लोग करते हैं पूजा।
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एटा। बौद्घ तीर्थ स्थल महाकारुणिक बुद्घ विहार बैरंजा, अचलपुर, मिरहची में 517 ईसा पूर्व महात्मा बुद्घ ने जिन आरिष शास्त्रों की स्थापना की थी, उनमें से एक आरिष शास्त्र को स्थानीय लोग शिवलिंग के रूप में पूज रहे हैं, जबकि यह बौद्घ समाज का प्रमुख आधार स्तंभ है। एटा जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर अतरंजी खेड़ा के नाम से मशहूर स्थान पर कंटीली झाड़ियों और मिट्टी के टीलों का बड़ा भूखंड है, जिसकी पर्यटन विभाग ने बाउंड्रीवॉल कराई है और यह पुरातत्व विभाग से संरक्षित है।
यहीं तथागत 517 ईसा पूर्व खेड़ा के राजा बैरज के आग्रह पर महात्मा बुद्ध प्रवास के दौरान रुके थे। महात्मा बौद्घ ने यहां काले पत्थर की गोल आकृति के चार पत्थर स्थापित किए। इन्हें नाम दिया आरिष शास्त्र। देश में उन्होंने ऐसे 12 आरिष शास्त्र अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए। इसमें से अतरंजी खेड़ा में चार आरिष शास्त्र एक साथ स्थापित किए।
देश में 12 स्थान पर हैं आरिष शास्त्र
भंते प्रज्ञा सिंह ने बताया कि महात्मा बुद्घ ने देशभर में प्रवास के दौरान करीब 12 आरिष शास्त्र विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए। इनके माध्यम से बौद्घ धर्म के प्रचार-प्रसार सहित इन पर लिखीं पंक्तियां बौद्घ समुदाय के लिए विशेष हैं। कारण महात्मा बुद्घ का इन्हीं पत्थरों पर उत्कीर्ण आलेख मिलता है। बताया कि त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत, आसाम, अरुणाचल प्रदेश सहित बौद्घ स्थानों पर यह आरिष शास्त्र स्थापित हैं।
लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू की
अतरंजी खेड़ा में स्थित चार आरिष शास्त्रों में से दो आरिष शास्त्रों पर महात्मा बुद्घ द्वारा दिए गए संदेश अंकित हैं, जबकि एक आरिष शास्त्र के पत्थर पर उत्कीर्ण पंक्तियां गायब हो गई हैं। इसके चलते लोगों ने इसे काले पत्थर का शिवलिंग मानकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। हालांकि उसके समीप ही तीन अन्य आरिष शास्त्र स्थापित हैं, पर लोगों की आस्था के आगे यह गौढ़ हो गए हैं। एक आरिष शास्त्र पर ग्रामीणों ने कोठरी बनाकर उसे मंदिर का रूप दे दिया है।