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वतन पर मरने वालों का नहीं बाकी निशां होगा

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एटा। आजादी की लड़ाई में जनपद के रणबांकुरे भी पीछे नहीं रहे। इनकी बहादुरी एवं गोरिल्ला नीति से जहां तत्कालीन गोरी सरकार भयभीत थी, वहीं इनकी शहादत को आजाद भारत में वांछित सम्मान भी नहीं मिल सका। सरकारें ही नहीं लोग भी इनके बलिदान को भूल गए। परिवारीजनों की पीड़ा है कि वर्तमान सरकारें इनके नाम को जिंदा रखने के लिए कुछ नहीं कर रहीं।
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देश की खातिर जान की बाजी लगाने वाले अपने ही वतन में उपेक्षा का शिकार हैं। क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर के गांववालों का कहना है कि महान क्रांतिकारी को किसी भी सरकार से सम्मान नहीं मिला। आजादी के दशकों बाद भी उनके गांव, क्षेत्र में उनके नाम पर कुछ भी नहीं किया गया। उपेक्षा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि निकटवर्ती कसबा राजा का रामपुर में उनकी प्रतिमा का अनावरण नहीं हो सका।
स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संग्राम सेनानी बाबूराम वर्मा के परिवारीजन भी शासन-प्रशासन की उपेक्षा से आहत हैं। इनका कहना है कि शासन ही नहीं स्थानीय प्रशासन भी इन क्रांतिकारियों की अनदेखी कर रहा है। शहर में लगीं प्रतिमाओं की उपेक्षा से वे आहत हैं।
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जीटी रोड-रेलवे रोड चौराहे पर लगी बाबूजी की प्रतिमा का अपमान देखकर वे आहत हैं। समय-समय पर वे लोग पहुंचकर यहां की सफाई कराते हैं। मगर स्थानीय प्रशासन गंभीर नहीं है। मूर्ति परिसर शराबियों-नशेड़ियों का अड्डा बन गया है। शराब के पाउच-बोतलें यहां की पहचान बन गए हैं।
- डॉ. निरूपमा वर्मा, पौत्रवधू स्वर्गीय बाबूराम वर्मा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, एटा
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शहीद महावीर सिंह राठौर की शहादत को सम्मान नहीं मिला। शासन-प्रशासन की उपेक्षा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पैतृक गांव में ही नहीं निकटवर्ती कस्बे में भी इनके नाम का कोई स्मारक नहीं है। इनकी प्रतिमा को वर्षों अनावरण का इंतजार करना पड़ा। इनके नाम से शुरू की गई शैक्षिक संस्था को 35 वर्ष बाद भी उच्चीकरण का इंतजार है।
- बलवीर सिंह राठौर, अधिवक्ता, निवासी शाहपुर टहला
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काकोरी कांड, सांडर्स हत्याकांड में शामिल थे महावीर
एटा। राजा का रामपुर थाना क्षेत्र के गांव शाहपुर टहला निवासी महावीर सिंह राठौर का नाम किसी से छिपा नहीं है। आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले इस वीर से जनपदवासियों का सीना चौड़ा है। बचपन से ही आजादी के रंग में रंगे महावीर ने जवानी में कदम रखते ही अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया। 16 सितंबर 1904 को शाहपुर टहला में जन्मा यह वीर 20 वर्ष की उम्र में ही गोरी सरकार की आंख की किरकिरी बन गया। राजकीय इंटर कालेज एटा से इंटर की परीक्षा पास करने के बाद स्नातक शिक्षा के लिए डीएवी कालेज कानपुर गए महावीर सिंह को आजादी के रणबांकुरों का सानिध्य क्या मिला कि वे पूरी तरह देश के लिए समर्पित हो गए। काकोरी कांड, सांडर्स हत्याकांड में भूमिका निभाने वाले महावीर सिंह गोरों की आंख के किरकिरी बन गए। इसी दौरान कानपुर छोड़कर कासगंज निवासी एक बुकसेलर के यहां नौकरी कर ली। 1929 में पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के साथ काकोरी कांड में शामिल महावीर को कालेपानी (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई गई। 17 मई 1933 को अंडमान निकोबार सेलुलर जेल में भूख हड़ताल करते हुए यह वीरगति को प्राप्त हुए।

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भगत सिंह ने भी गुजारे तीन माह
एटा (ब्यूरो)। अन्य क्रांतिकारियों का भी महावीर सिंह के गांव शाहपुर टहला में आना जाना बढ़ गया। पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते यह लोग यहां आकर समय गुजारते थे। बीमारी की हालत में भगत सिंह ने तो तीन माह इनके घर रहकर गुजारे थे। इनका उपचार महावीर सिंह के पिता वैद्य देवी सिंह एवं परिचर्या मां शारदा देवी ने की थी।

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आए थे गांधीजी और शास्त्रीजी
एटा। स्वर्गीय बाबूराम वर्मा की पुत्रवधू शारदा वर्मा ने बताया कि असहयोग आंदोलन के आह्वान के लिए महात्मा गांधी शहर में आए थे। वर्तमान सब्जी मंडी में उनकी सभा हुई थी। वहीं घंटाघर पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई थी। आंदोलन के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री भी घर आए थे।

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इमारतों की उपेक्षा
एटा। अंग्रेजी हुकूमत का बनी इमारतें मरम्मत के अभाव में जर्जर हो रही हैं। शहर का घंटाघर, मेहता पुस्तकालय आदि भी बदहाली का शिकार हैं। संबंधित सभासदों का कहना है कि प्रस्ताव के बाद भी इनकी मरम्मत नहीं होने से यह जर्जर हो रहे हैं।
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