80 फीसदी एटीएम कैशलेस, जनता हुई हेल्पलेस
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नोटबंदी के तीस दिन बाद भी बैंक और एटीएम के बाहर लाइने छोटी नहीं हो रहीं। जिले की 80 फीसदी एटीएम कैशलेस हो चुके हैं। इससे लोगों की जरूरतें पूरीं नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बैंकों में आई करीब 400 करोड़ रुपये की नई करेंसी आखिर कहां डंप हो गई। बैंकर्स का कहना है कि खातों में सैलरी आने और एटीएम खाली होने से भीड़ है। वहीं व्यापारियों, किसानाें और आमजन ने कहा कि पहले नोट जमा कराने के लिए लाइनें लगाई और अब खाते से रुपये निकालने के लिए धक्के खाने पड़ रहे हैं। आलम यह है कि नकदी संकट के कारण उद्योग, लघु उद्योग बंद हैं। किसान खाद और बीज खरीदने के लिए नकदी संकट से जूझ रहे हैं। बड़े कारोबारी और शोरूम संचालक स्वाइप मशीने लगा कर धंधा चला रहे हैं, लेकिन चाय, खोखा, ठेली पर सब्जी बेचने, फुटकर दूध और फल विक्रेताओं के लिए स्वाइप मशीने जुटाना भारी पड़ रहा है। इसके चलते शहर से लेकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई है।
जेलसर का घंटा-घुंघरु उद्योग चौपट
तीन सौ करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करने वाला जलेसर को घुंघरु-घंटा कारोबार नकदी संकट के कारण बंद पड़ा है। फैक्ट्रियों से धुआं निकलना बंद है। मजदूर-कारीगर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। नकदी संकट से दीवाली पर भेजे आर्डर का भुगतान नहीं मिला है। फैक्ट्रियां बंद होने से चोरी की वारदातें बढ़ रहीं हैं। घंटा-घुंघरु व्यापारी विकास मित्तल ने कहा उद्योग नोटबंदी के पचास दिन बाद भी नहीं उबरेगा। कुछ लोगों ने पुराना माल बेच दिया, लेकिन भुगतान नहीं आया। मजदूरों, कारीगर, छोटे आईटम खरीदने के लिए कैश नहीं है। छोटे सामान खरीदने को कैशलेस व्यवस्था लागू नहीं हो सकती। विकास बोले नोटबंदी से पहले एक लाख रुपये कम थे, लेकिन नोटबंदी के बाद जेब में पांच हजार रुपये ज्यादा लग रहे हैं।
मंडियों में खरीदारी ठप, शुल्क बचा चौथाई
जिले में एक मेन मंडी और तीन उप मंडी हैं, लेकिन नकदी संकट के कारण व्यापारी धान नहीं खरीद रहे। किसान चेक से भुगतान लेेने को तैयार नहीं है। इसके चलते किसानों को फसल बेचने में दिक्कत आ रही है, वहीं मंडियों को हर रोज तीन लाख रुपये राजस्व का घाटा उठाना पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि सरकार ने निकासी लिमिट हटा दी, लेकिन जरूरत के मुताबिक मंडी में खरीदारी के लिए बैंक से रुपये नहीं मिल रहा। किसानों ने कहा कि ग्रामीण बैंक, कोआपरेटिव बैंकों में रुपये नहीं हैं। पांच हजार की जरूरत पूरी करने में मुश्किल है।