भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कांवड़िए कड़ी मेहनत के साथ इस साधना को पूरा कर पाते हैं। राजस्थान एवं मध्य प्रदेश क्षेत्र के कांवड़ियों की टोलियां प्रतिदिन 50 से 60 किलोमीटर पैदल चलने के बाद रास्ते में सही जगह मिलने पर आराम कर लेते हैं।
ये कावड़िए लगातार कई दिनों तक चलने के बाद शिवरात्रि पर अपने गंतव्य पर पहुंचकर जलाभिषेक कर पाते हैं। 400 से 500 किलोमीटर दूर तक के कावड़िए यहां कांवड़ भरने के लिए आते हैं। जो इस यात्रा के लंबे पड़ाव को काफी कष्ट झेलने के बाद पूरा कर पाते हैं।
लेकिन श्रद्धा के आगे यात्रा का व्यवधान एवं होने वाला कष्ट बाधा नहीं बन पाता। कावड़िए सोरों तीर्थ के अलावा, मथुरा, वृंदावन एवं अन्य देव स्थानों का भ्रमण करते हुए अपने गंतव्य की ओर जाते हैं।
लहरा से कांवड़ उठाने के बाद कांवड़िए तीर्थ नगरी सोरों पार करने के बाद ही रुककर विश्राम करते हैं। इसके बाद 5 से 6 किलोमीटर के बाद कांवड़ियों की टोलियां विश्राम को रुक जाती है। थोड़ी थोड़ी देर विश्राम के बाद यह टोलियां आगे बढ़ती हैं।
तमाम भक्त बिना अन्य ग्रहण किए ही केवल फलाहार से कांवड़ उठाते हैं। वहीं कुछ शिव भक्त भोजन भी करते हैं। इसके अलावा चाय, दूध, जूस आदि का सेवन करते हैं। पैरों की मालिश के लिए तेल की शीशी भी उनके साथ रहती है।
मध्य प्रदेश शिवपुरी के निवासी महंत रामसिंह कुशवाह की टोली भी यहां से कांवड़ लेकर गई है। उन्होंने बताया कि वह ग्यारहवीं बार कांवड़ भरकर ले जा रहे हैं। उनका यह सिलसिला पिछले 11 वर्षों से चल रहा है।
उन्होंने कहा कि मथुरा व अन्य स्थानों पर दर्शन करते हुए अपने स्थान पर पहुंचते हैं। प्रतिदिन 50-60 किलोमीटर की यात्रा करनी होती है। भगवान शिव की शक्ति से ही यह सब हो पाता है।