पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में जिले में इस बार मनरेगा पर 50 प्रतिशत भी धन खर्च नहीं हो पाया है। इससे नाराज सीडीओ साहब सिंह ने अधीनस्थों को निर्देशित किया है कि जिले में मनरेगा द्वारा होने वाले कार्य रुकने नहीं चाहिए। वहीं, मनरेगा का काम देख रहे ग्राम्य विकास विभाग का कहना है कि मनरेगा श्रमिकों को एफटीओ (फंड ट्रांसफरिंग आर्डर) के माध्यम से होने वाले भुगतान में देरी होने के कारण इससे होने वाले कार्यों में रुकावट आई थी। मगर जिले में एक बार मनरेगा के कार्य शुरू हो चुके हैं।
विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2013-14 में मनरेगा योजना पर 26.70 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। चालू वित्तीय वर्ष में अब तक कुल 12 करोड़ ही खर्च हो पाए हैं। वहीं पिछले वित्तीय वर्ष 15.92 लाख श्रम दिवसों का आयोजन किया गया। इसके सापेक्ष चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 3.80 लाख श्रम दिवसों का ही आयोजन किया गया है। इसके चलते मुख्य विकास अधिकारी ने संबंधित अधिकारियों सहित सभी ग्राम पंचायतों को निर्देशित किया है कि मनरेगा योजना से अधिक से अधिक कार्य कराए जाएं। ऐसा न होने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा सभी को यह भी निर्देशित किया गया है कि मैटेरियल पर योजना का सिर्फ 40 प्रतिशत ही धन खर्च होगा। बाकी 60 प्रतिशत श्रमिकों पर किया जाएगा।
इन कारणों से नहीं चढ़ सकी योजना परवान
विभागीय अधिकारियों की मानें तो मनरेगा योजना में श्रमिकों के लिए शुरू हुआ एफटीओ से भुगतान सबसे बड़ी परेशानी का सबब बना। इस भुगतान के शुरू होते ही तकनीकी कारणों से जिले के श्रमिकों का करोड़ों का धन शासन में फंस गया। इसके चलते श्रमिकों ने मनरेगा में काम करना बंद कर दिया। वहीं संबंधित ग्राम पंचायत के प्रधानों ने भी इस योजना से हाथ खड़े कर लिए। मगर अब श्रमिकों का पिछला भुगतान पूरा होने के बाद इस योजना को फिर से तेज गति से शुरू किया जा रहा है।
मनरेगा में नियमानुसार अधिक से अधिक कार्य कराने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया है। मनरेगा में अब श्रमिकों को भुगतान करनेे में भी कोई समस्या नहीं आ रही है।
- एमएन त्रिवेदी, डिप्टी कमिश्नर, मनेरगा