माया सरकार में अहम रहे अफसरों को अखिलेश राज में अहमियत दिए जाने की सपा कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद आईएएस अफसरों में खलबली मची हुई है। हर कोई एक दूसरे से सवाल कर रहा है कि कौन से अफसर सपा कार्यकर्ताओं के निशाने पर हैं और क्या सचमुच अखिलेश सरकार ने उन्हें दरकिनार कर देने की तैयारी कर ली है।
यह सवाल उन अफसरों को ज्यादा परेशान किए हुए हैं जो बसपा सरकार के दुलारे होने के बावजूद इस वक्त भी सपा सरकार की कृपा पाने में भी कामयाब हो गए हैं। उनकी चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि यूपी को एक सौ ग्यारह प्रमोटी आईएएस मिल जाने के बाद अब जल्द एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल की उम्मीद की जा रही है। अब देखना दिलचस्प होगा कि अपने ‘अतीत’ के लिए खासे चर्चित अफसर पहले की तरह मुख्यधारा में बने रहने में कामयाब हो पाएंगे, या फिर हाशिए पर भेजे जाएंगे।
गौरतलब है कि मंगलवार को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की मौजूदगी में कार्यकर्ताओं ने मायाराज के अफसरों को अहमियत दिए जाने पर सवाल उठाया था। मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई अलग अलग मौकों पर कह चुके हैं कि उन्हें बसपा राज के पुराने अफसरों से काम चलाना पड़ रहा है और इसी कारण प्रशासनिक कामकाज में तेजी नहीं आ पा रही है। वे कहते रहे हैं कि उस तरह के अफसरों की मानसिकता बदली नहीं है। बदलाव की बयार की प्रबल संभावना को भांपकर अफसरों ने अपने-अपने आकाओं के आगे गणेश परिक्रमा शुरू कर दी है।
मंगलवार को सपा कार्यकर्ता की शिकायत सार्वजनिक होने के बाद आईएएस अफसरों में बुधवार को सपा महासचिव राम गोपाल यादव से मिलने की होड़ देखी गई। पीसीएस से आईएएस बने कई अफसर प्राइम पोस्टिंग के लिए जोड़तोड़ में लग गए हैं। उनकी निगाह डीएम व कमिश्नर पदों पर है।
उधर, कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर परफार्मेंस अच्छी न होने के कारण ही सरकार पर दवाब है कि पुलिस महकमे में भी बदलाव करे। असल में सपा कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर नाराजगी है कि मायाराज के पुराने अफसरों को अभी भी खासी तवज्जो मिली हुई है। वैसे कामराज रिजवी, हिमांशु कुमार, संजय अग्रवाल, आलोक रंजन, समेत कई आईएएस अफसर ऐसे हैं जिनको बेहतर कामकाज के कारण पिछली सरकार के साथ-साथ इस सरकार में भी खासी तवज्जो मिली हुई है। मायाराज के कई दुलारे आरपी सिंह, अनिल संत, रवींद्र सिंह, बलविंदर कुमार जैसे खास अफसर अब केंद्रीय प्रतिनियक्ति पर दिल्ली जा चुके हैं।
पिछले साल दिवाली के मौके पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दरबार में बधाई देने जब मायाराज के खास अफसर पहुंचे तो कानाफूसी का दौर शुरू हो गया। इन अफसरों में दुर्गाशंकर मिश्र, नेतराम व नवनीत सहगल प्रमुख हैं।
इन अफसरों पर टिकी है नजर
किश्न सिंह अटोरिया: प्रमुख सचिव राजस्व
अटोरिया पिछली बसपा सरकार में सिंचाई के साथ-साथ आबकारी महकमे के भी प्रमुख सचिव थे। सपा सरकार आते ही अटोरिया को इन विभागों से हटाकर कमिश्नर बना दिया गया, लेकिन जल्द ही उनको राजस्व विभाग प्रमुख सचिव बना कर अहम तैनाती दे दी गई।
महेश गुप्ता: आबकारी आयुक्त
आबकारी आयुक्त रहते हुए महेश गुप्ता को मायाराज की नई आबकारी नीति बनाने का श्रेय जाता है। यह नीति एक साल के बजाए दो साल के लिए बनाई गई। न जाने क्यों सपा सरकार ने उसी नीति को आगे जारी रखने का निर्णय तो लिया ही, महेश गुप्ता को भी आबकारी आयुक्त बनाए रखा है। यह नीति दिवंगत पौंटी चड्ढा के समूह को खास तौर पर फायदा पहुंचाने के लिए ही बनाई गई थी।
माजिद अली: प्रमुख सचिव पंचायती राज
हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट बनाने का ठेका मनचाही कंपनी को देने में यूं तो मायाराज में पंचम तल के अफसरों की खासी भूमिका रही। लेकिन इसे उत्साह से पूरा करने का काम माजिद अली ने प्रमुख सचिव परिवहन रहते किया। माजिद अली ने इस सरकार में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए खासी कोशिशें की और शुरूआती झटकों के बाद कामयाब हो गए। उन्हें कुछ समय के लिए सहकारिता विभाग भी मिला। इस वक्त वे प्रमुख सचिव पंचायती राज हैं जिसके जिम्मे गरीबों को कंबल व धोती बांटना है।
सदाकांत: प्रमुख सचिव समाज कल्याण
बलविंदर कुमार के पिछले साल जुलाई में केंद्रीय प्रतिनियक्ति पर जाने पर मायावती ने प्रमुख सचिव समाज कल्याण सदाकांत को खाद्य एवं रसद विभाग दिया। बाद में यह विभाग उनसे ले लिया और बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग दे दिया। सदाकांत के पास अब भी समाज कल्याण व बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग है।
रमा रमण: सीईओ ग्रेटर नोएडा
जब मोहिन्दर सिंह नोएडा व ग्रेटर नोएडा के अध्यक्ष थे तो रमा रमण ग्रेटर नोएडा के सीईओ थे। नई सरकार ने मोहिन्दर सिंह को हटाकर सामान्य प्रशासन भेज दिया लेकिन रमा रमण इसी पद पर बरकरार हैं।
जितेंद्र कुमार: सचिव मानवाधिकार आयोग
परिवहन विभाग के सचिव रहते हुए मनमाने तरीके से हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट का ठेका मनपसंद कंपनी का देने में उनकी भूमिक भी रही। उसी दौर में सचिव माध्यमिक शिक्षा रहते हुए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों के भवन निर्माण घोटाले में भी उनका नाम आया था। इसी कारण लैकफेड घोटाले की जांच अब उन तक पहुंच रही है। इसके बावजूद नई सरकार ने उन्हें सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग बनाया गया, लेकिन इस फैसले की आलोचना के बाद फिर उन्हें सचिव मानवाधिकार आयोग बना दिया।