संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। भागमभाग भरी जिंदगी, मानसिक तनाव, अकेलापन, घरेलू विवाद, व्यवसाय में घाटा, आर्थिक तंगी, प्रेम संबंध में असफल और कम समय में लक्ष्य हासिल करने की सोच युवाओं को गलत कदम उठाने पर मजबूर कर दे रही है।
इसका नतीजा यह हो रहा है कि जिंदगी से हताश युवा संघर्ष के बजाय मौत को गले लगा रहे हैं। युवाओं के इस तरह के आत्मघाती कदम उठाने परलोग चिंतित हैं।
फंदे से लटक कर युवती ने जान दे दी या युवक फंदे से लटक गया, ऐसी घटनाएं जिले में कमोवेश रोजाना हो रहे हैं। पिछले दिनों गौरी बाजार में एक युवती का शव फंदे से लटका हुआ मिला था। बरियारपुर में पारिवारिक कलह से परेशान एक नवविवाहिता का शव कमरे में पंखे से फंदा लकार लटका हुआ मिला था। इस तरह की घटनाएं क्यों हो रही हैं, इसके लिए समाज शास्त्री और मनोवैज्ञानिक से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि बेरोजगारी, गरीबी, बेघर होना और भेदभाव किया जाना आदि कारण हैं।
स्वामी देवानंद पीजी काॅलेज मठ लार के समाजशास्त्र विभाग के डाॅ. संतोष कुमार गुप्ता ने बताया कि आत्महत्या एक सामाजिक समस्या है। इसके कारण समाज में ही ढूंढ़ने होंगे। वर्तमान युवा पीढ़ी में आत्महत्या का जो मुख्य कारण हमें देखने को मिल रहा है वह उनकी अपेक्षा का उच्च स्तर है, जो आभासी दुनिया से उनके पास पहुंच रहा है। वह सामाजिक जीवन के वास्तविक संघर्षों को नहीं जान पा रहे हैं और न ही जानने की कोशिश रहे हैं। सिर्फ छोटी छलांग से लंबी दूरी नापने का प्रयास कर रहे है।