दो सूबे की कानूनी जटिलताओं में फंसी रिहाई।
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बेटे के कत्ल के आरोप में आजीवन कारावास के मुजरिम को कारागार प्रशासन ने उम्र, हालात और चाल-चलन के आधार पर 48 साल की सजा के बाद रिहाई का मौका दिया है लेकिन दो सूबे के बीच कानूनी कागजी जटिलताओं के चलते उसे रिहाई नहीं मिल पा रही है। रिहाई की सरकारी कोशिशें यूपी के जेल अफसरों से लेकर देवरिया और गोपालगंज (बिहार) के जिला स्तरीय अफसरों की फाइलों तक कैद हो जा रही हैं।
यह अजीबोगरीब दास्तान है गोपालगंज (बिहार) जिले के हरदिया बाजार निवासी अंबिका प्रसाद यादव की। देवरिया जनपद की सीमाओं में दाखिल होकर अपने बेटे को कत्ल करने के आरोपी अंबिका को 19 अगस्त 1966 को देवरिया की जिला अदालत से आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। मसला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा लेकिन 26 फरवरी 1969 को हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए सत्र न्यायालय के सजा के फैसले को बहाल रखा।
दस अगस्त 1966 से अंबिका की सजा का सफर केंद्रीय कारागार वाराणसी से शुरू हुआ और 48 साल की सजा काट लेने के बाद जेल प्रशासन ने रिहाई पर गौर शुरू किया। इसकी नौबत आई सजा के बीच की अवधि में अंबिका की स्थिति में वक्त-वक्त पर आए बदलाव से।
प्रशासनिक सूत्र बताते हैं कि वाराणसी केंद्रीय कारागार में सजा के बीच शारीरिक क्षय के साथ अंबिका की मानसिक हालत भी बिगड़ी। स्थिति ज्यादा खराब होने पर उसे आठ अप्रैल 1971 को वाराणसी के मानसिक चिकित्सालय भेजा गया। करीब 40 साल बाद डॉक्टरी नजरिए में सामान्य बताने पर 16 अप्रैल 2011 को केंद्रीय कारागार वापस लाया गया। इस बीच सजा की बड़ी अवधि बीतने और शारीरिक व मानसिक चेतना कम होते रहने पर जेल प्रशासन ने समय पूर्व रिहाई के ख्याल से आईजी जेल को चिट्ठी भेजी।
लखनऊ से इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने पर वाराणसी केंद्रीय कारागार प्रशासन ने जरूरी कानूनी औपचारिकता के लिए देवरिया के डीएम और एसपी दफ्तर से आख्या मांगी। अंबिका की पृष्ठभूमि बिहार की होने के कारण देवरिया के प्रशासन ने ऐसी ही रिपोर्ट की अपेक्षा के साथ गोपालगंज के जिला प्रशासन को पत्र भेजा। साल 2012 से ऐसे पत्राचार का दौर चल रहा है लेकिन कानूनी राय और मुकम्मल हल अभी तक सामने नहीं आया है। रिहाई के मुहाने पर पहुंचकर भी जेल प्रशासन अंबिका को सलाखों से बाहर विदाई नहीं दे पा रहा है।