देवरिया। मार्च से मई तक का समय आगलगी के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। पछुआ चलने पर छोटी सी चिंगारी भी भीषण आग का कारण बन जाती है। कई बार तो स्थितियां इतनी विकट हो जाती हैं कि दमकल की गाड़ियों के अलावा स्थानीय उपाय भी करने पड़ते हैं।
वहीं, कुछ ही देर के अंतराल में पांच से सात जगह आग लगने की सूचना आने पर दमकल कर्मियों की भागदौड़ काफी बढ़ जाती है। ऐसे में जिले के अग्निशमन विभाग में संसाधनों की कमी से चिंता बढ़ गई है। स्थिति यह है कि जिले में दमकल की सात गाड़ियों को चलाने के लिए केवल दो ही ड्राइवर हैं।
जिले में वर्तमान में देवरिया मुख्यालय और मझौलीराज में फायर स्टेशन क्रियाशील हैं। विभाग का दावा है कि आग लगने की सूचना मिलते ही 52 सेकंड के भीतर टीम रवाना कर दी जाती है। बरहज तहसील क्षेत्र में अब तक कोई स्थायी फायर स्टेशन या संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, रुद्रपुर और भाटपार रानी क्षेत्रों को एक-एक वाहन जरूर दिया गया है, लेकिन व्यापक जरूरतों के मुकाबले यह नाकाफी साबित हो रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अग्निशमन कार्य और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अग्निशमन विभाग के बेड़े में कुल सात बड़े वाटर टेंडर हैं। इनमें 4500 लीटर क्षमता का एक, 2500 लीटर क्षमता के दो, 2000 लीटर क्षमता का एक और 700 लीटर क्षमता के एक वाहन शामिल हैं। इसके अलावा, 400 लीटर क्षमता का एक एफक्यूआरवी (फास्ट क्विक रिस्पांस व्हीकल) और एक झाग आधारित विशेष वाहन भी उपलब्ध है, जो पेट्रोल पंप या रासायनिक आग पर काबू पाने के लिए उपयोगी होता है। साथ ही, दो 60 लीटर क्षमता की बुलेट गाड़ियां भी हैं, जिनका उपयोग त्वरित प्रतिक्रिया के लिए किया जाता है।
हर वर्ष अप्रैल, मई और जून के महीनों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ जाती हैं। पिछले वर्ष 2025 में विभाग के मुताबिक, जिले में आग लगने की करीब 658 घटनाएं सामने आई थीं। इनमें खेत-खलिहान, ग्रामीण और शहरी इलाकों की घटनाएं शामिल हैं।
इसके बावजूद संसाधनों और कर्मियों की कमी अब भी बनी हुई है। विभाग में मुख्य अग्निशमन अधिकारी (सीएफओ) के नेतृत्व में कार्य चल रहा है, लेकिन चालक जैसे अहम पदों पर भारी कमी चिंता का विषय बनी हुई है।
इसके अलावा महज 36 कर्मचारियों के कंधों पर जिले के किसानों और झोपड़ियों की सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है, जिनमें 31 फायरमैन शामिल हैं। इन दिनों गेहूं की फसल पूरी तरह से पककर तैयार है।