शिवानंद चौरसिया का शव बुधवार को गांव पहुंचते ही पूरे क्षेत्र में मातम छा गया। कई दिनों से जिस पल का परिवार इंतजार कर रहा था, वह पल आते ही दर्द के सैलाब में बदल गया। ताबूत में बंद शिवानंद का शव देखते ही परिजनों का धैर्य जवाब दे गया और घर-आंगन में चीख-पुकार मच गई।
पत्नी सुशीला पति का शव देखते ही दहाड़ मारकर रोने लगीं। वह बार-बार शव से देखकर विलाप करती रहीं और कई बार बेहोश होकर गिर पड़ीं। आसपास मौजूद महिलाएं उन्हें संभालतीं, पानी पिलाकर होश में लातीं, लेकिन पति को खोने का दर्द उन्हें बार-बार बेसुध कर दे रहा था।
पिता रामजी चौरसिया और मां कलावती देवी का भी रो-रोकर बुरा हाल था। मां बेटे के चेहरे को निहारते हुए बेसुध हो गईं, जबकि पिता बार-बार यही कहते रहे कि बुढ़ापे का सहारा उनसे छिन गया। छोटे भाई रामप्रवेश चौरसिया भी अपने बड़े भाई के शव को देखकर फूट-फूटकर रो पड़े।
जब चार वर्षीय पुत्र राजवीर अपने पिता को पुकारते हुए जोर-जोर से रोने लगा। मासूम की चीख और बेबसी देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं। गांव की महिलाएं सिसक उठीं और कई लोगों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
घर के बाहर सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ जमा रही। हर चेहरा गम में डूबा नजर आया। लोगों की जुबान पर यह बात आम थी कि गांव ने अपना एक प्रिय बेटा, परिवार ने अपना सहारा और मासूम बेटे ने अपने पिता को हमेशा के लिए खो दिया।