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Deoria News: नेपाल की त्रासदी ने ताजा कर दी 1998 की प्रलयंकारी बाढ़ की याद

Fri, 28 Aug 2026 12:35 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
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राप्ती के पानी से घिरे भदिला प्रथम गांव से नाव के सहारे आवाजाही करते ग्रामीण।
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देवरिया/बरहज। नेपाल में बुधवार को आई विनाशकारी बाढ़ ने बरहज क्षेत्र के लोगों के जेहन में 28 साल पुरानी बाढ़ की भयावह यादें फिर ताजा कर दी हैं। वर्ष 1998 में सरयू ने ऐसा रौद्र रूप दिखाया था कि बरहज नगर से लेकर दियारा क्षेत्र तक चारों ओर पानी ही पानी नजर आने लगा था। नदी बरहज में खतरे के निशान 66.50 मीटर से 2.12 मीटर ऊपर 68.62 मीटर तक पहुंच गई थी। कुरह परसिया गांव में दर्जनों मकान नदी में समा गए थे। कटइलवा में भी भारी तबाही हुई थी। बरहज नगर के मुख्य चौक, सब्जी मंडी और प्रमुख सड़कों पर पानी बहने लगा था। लोगों को आवागमन के लिए नावों का सहारा लेना पड़ा था।
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नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में बुधवार को आई विनाशकारी बाढ़ भोटेकोशी नदी के रास्ते त्रिशूली और फिर नारायणी नदी की ओर बढ़ी है। नारायणी भारत में आगे गंडक नदी बनती है। ऐसे में वर्ष 1998 की परिस्थितियां लोगों को डरा रही हैं। उस समय नेपाल और हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और नदियों में आए भारी उफान के दौरान पूर्वांचल ने भीषण बाढ़ झेली थी। बरहज में सरयू का जलस्तर 68.62 मीटर तक पहुंच गया था। यह रिकॉर्ड 24 वर्ष तक कायम रहा और वर्ष 2022 में टूटा।
वर्ष 1998 की तबाही का सबसे दर्दनाक अध्याय कुरह परसिया गांव रहा। कई परिवारों ने अपने हाथों से मकान तोड़कर ईंट, सरिया, खिड़की-दरवाजे और घरेलू सामान समेटा तथा सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए। कुछ विस्थापित परिवारों को बाद में जमीन देकर बसाया गया, जबकि कई परिवार लंबे समय तक बेघर रहे।
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बाढ़ ने कटइलवा क्षेत्र में भी तबाही मचाई थी। पानी बरहज कस्बे में घुसा तो मुख्य चौक और सब्जी मंडी नदी की धारा जैसे नजर आने लगे। पुलिस चौकी के आसपास लोगों को नाव से निकाला गया। गौरा, तिवारीपुर और जयनगर समेत नगर के कई हिस्सों में घरों तक पानी पहुंच गया था। हालात इतने खराब हुए कि बीआरडीबीडी पीजी कॉलेज आश्रम बरहज, श्रीकृष्ण इंटर कॉलेज, हर्ष चंद इंटर कॉलेज और मिशन स्कूल समेत कई शिक्षण संस्थानों को बाढ़ शरणालय बनाना पड़ा था। लोगों के सामने भोजन और साफ पानी की समस्या खड़ी हो गई थी। पशुओं के लिए चारा जुटाना मुश्किल था। गांवों के संपर्क मार्ग डूब जाने के कारण नाव ही आवागमन का प्रमुख जरिया रह गई थी।
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25 से ज्यादा गांव और मजरों में आई थी तबाही
बरहज इलाके में सरयू और राप्ती नदी का संगम है। इस नाते इस इलाके में बाढ़ अधिक प्रभाव डालती है। कुरह परसिया, कटइलवा, बेलडांड, राजपुर-नौकाटोला, परसियां तिवारी, परसियां देवार, विशुनपुर देवार, भदिला प्रथम, पैना, कोटवां, सतरांव, मईल, नरसिंहडांड़, तेलिया कला, अड़िला, बकुची, कपरवार, केवटलिया, तालिया कला, रगरगंज, नरियाव, दसरसिया टोला, राजभर टोला, चौधरीपुरा और नकिहवा जैसे गांव-मजरे बाद की बाढ़ों में भी बार-बार प्रभावित होते रहे हैं। 1998 में भी इन गांवों सहित 25 से ज्यादा गांव और मजरे प्रभावित हुए थे। यह क्षेत्र हर बड़ी बाढ़ में सबसे संवेदनशील रहा है।
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बाढ़ के बाद सांप और कीड़ों का फैल गया था खौफ
वर्ष 1998 की प्रलयंकारी बाढ़ में पानी उतरने के बाद भी लोगों की मुश्किलें कम नहीं हुई थीं। जलभराव वाले इलाकों में सांप और दूसरे विषैले जीव-जंतुओं का खतरा बढ़ गया था। घरों, झोपड़ियों और ऊंचे स्थानों पर शरण लिए लोगों को रात गुजारना मुश्किल हो रहा था। जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भी बाढ़ के दौरान सर्पदंश को प्रमुख खतरा मानते हुए बचाव संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए थे।
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नेपाल में भारी बारिश तब भी बनी थी वजह
वर्ष 1998 की प्रलयंकारी बाढ़ के पीछे यूं तो कई कारण थे मगर उनमें एक बड़ा कारण था नेपाल से भारत में आने वाला पानी। जुलाई-अगस्त में हुई असाधारण बारिश से राप्ती, सरयू, गोर्रा और छोटी गंडक समेत कई नदियां उफान पर आ गई थीं। इसी बीच नेपाल और हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा से नदियों में पानी का दबाव बढ़ा था। कई स्थानों पर तटबंध टूटने से पानी तेजी से गांवों और खेतों में फैल गया था। नदियों में गाद जमा होने, जलधारा की क्षमता घटने और देवरिया-बरहज के निचले समतल भूभाग ने स्थिति और गंभीर कर दी।
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28 हजार आबादी हुई थी प्रभावित
वर्ष 1998 की प्रलयंकारी बाढ़ ने बरहज क्षेत्र में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। पुराने रिकॉर्ड के अनुसार 25 गांवों की करीब 28 हजार आबादी प्रभावित हुई थी। लगभग 1,200 हेक्टेयर कृषि भूमि बाढ़ की चपेट में आई थी। करीब 4,500 पक्के और 1,500 कच्चे मकान प्रभावित हुए। कुर्ह परसिया में दर्जनों मकान सरयू में समा गए, जबकि कटइलवा में भी भारी नुकसान हुआ। बरहज कस्बे के मुख्य चौक, सब्जी मंडी और कई सड़कें जलमग्न हो गई थीं। प्रभावित परिवारों को शिक्षण संस्थानों में बनाए गए बाढ़ शरणालयों में ठहराया गया था।
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फिर ताजा हो गईं तबाही की यादें
1998 में पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि लोगों को समझने का मौका नहीं मिला। कई मकान नदी में समा गए। बहुत से परिवारों ने घर खुद तोड़कर ईंट, दरवाजे और जरूरी सामान बचाया और ऊंचे स्थानों की ओर चले गए।
अभय यादव, ग्राम प्रधान महेन
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उस समय खेत, रास्ते और घर सब पानी में घिर गए थे। गांव से बाहर निकलने के लिए नाव ही सहारा थी। पशुओं के लिए चारा नहीं मिल रहा था और पीने के साफ पानी की भी बड़ी समस्या थी।
डॉ. संजय सिंह सोलंकी
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मुख्य चौक, सब्जी मंडी और कई सड़कों पर पानी बह रहा था। पुलिस चौकी के आसपास नावें चलती थीं। गौरा, तिवारीपुर और जयनगर की तरफ घरों में पानी घुस गया था। लोग जरूरी सामान लेकर सुरक्षित जगह पहुंचे थे।
निशेष पांडेय, बरांव
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बाढ़ में चारों तरफ पानी ही पानी दिखता था। खेतों की फसल डूब गई थी और कई दिनों तक गांव टापू जैसा हो गया था। भोजन, पशुओं के चारे और आने-जाने की समस्या सबसे ज्यादा रही। पानी उतरने के बाद भी कीचड़ और बीमारी का डर लंबे समय तक बना रहा।
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ज्ञानेश्वर सिंह, कपरवार
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